दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

May 13, 2008

रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: मेंहदी हसन

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दिगार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो गिये थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वल-वले दैल-ए-ना-कर्दाकार के


तुम और फ़रेब खाओ

May 12, 2008

रचना: आग़ा हश्र
स्वर: फ़रीदा ख़ानुम

तुम और फ़रेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से
तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से

बरबाद-ए-दिल का आख़िरी सरमाया थी उम्मीद
वो भी तो युम ने छीन लिया मुझ ग़रीब से

गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है
होता है पहरों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से

धुंधला चली निगाह दम-ए-वापसी है अब
आ पास आ के देख लूँ तुझको क़रीब से

पहला भाग

दूसरा भाग


सजन लागी तोरी लगन मन मा

May 11, 2008

स्वर: फ़रीदा ख़ानुम

सजन लागी तोरी लगन मन मा
लाज मोहे आये हाय रे हाय
लगायी तेने कैसी लगन मन मा

हर आहट पर धड़के मनवा
छनके पायल मोरी खनके कंगनवा
तोरे बिन रसिया मोरे मन बसिया
पल पल होवे चुभन मन मा

मिलने की रैना महके सजरिया
सौतन द्वारे जइयो न सँवरिया
जल जल जाये सौतन घरवा

सजन लागी तोरी…


तसव्वुर ख़ानुम के गाये कुछ लोकगीत

May 10, 2008

तू मेरी ज़िन्दगी है

अगर तुम मिल जाओ

टूटी है मेरी है नींद मगर

मेरा दिलबर मेरा दिलदार


तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं

May 8, 2008

रचना: नासिर काज़मी
स्वर: बल्क़ीस ख़ानुम

तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं
मगर ये लोग पागल हो गये हैं
(बेकल == व्याकुल)

बहारें लेके आये थे जहाँ तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं

यहाँ तक बढ़ गये आलम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गये हैं
(शल == थक जाना)

कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं
(ताब == सहनशीलता, नातवाँ == कमजोर, मुसलसल == निरन्तर)

निगाह-ए-यास को नींद आ रही है
मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं
(निगाह-ए-यास == उदास आँखें, मुसर्दा == , पुरअश्क == आँसुओं से भरे)

उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं

जिन्हें हम देख कर जीते थे ‘नासिर’
वो लोग आँखों से ओझल हो गये हैं