ख़ुमार बाराबंकवी की कुछ ग़ज़लें…

August 11, 2009

ख़ुमार बाराबंकवी

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे…

ऐसा नहीं के उनसे मुहब्बत नहीं रही…

एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिये…

वो हमें जिस कदर आजमाते रहे…


…हिमालय की गोद में… – भाग 2

July 6, 2009

चौथा दिन: मुनश्यारी से चौकोड़ी (लगभग 90 किमी)

बादलों के अधीन मार्ग

बादलों के अधीन मार्ग

सुबह उठे तो देखा कि रात थोड़ी बारिश हुयी है और हवा में भी थोड़ी सिहरन है। समाचार मिला कि टनकपुर तवाघाट राजमार्ग भी कुछ समय के लिये अवरुद्ध रहा। खैर हमें तो उस मार्ग पर अभी दो दिन बाद सफ़र करना था। अगला पड़ाव चौकोड़ी था, जो पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों की सीमा पर स्थित है। जाने का मार्ग थल तक वही था जिससे आये थे उसके बाद बेरीनाग के लिये अलग सकड़ कट जाती है। इस रास्ते में कुछ अलग प्रकार के पहाड़ और चीड़ के सुव्यवस्थित घने जंगल थे। बेरीनाग से करीब 6 किमी पहले चौकोड़ी के लिये रास्ता जाता है जहाँ से ये करीब 3 किमी है। अपराह्न करीब 2 बजे हम लोग चौकोड़ी पहुँचे।
चीड़ के जंगल

चीड़ के जंगल

चौकोड़ी भी एक ठंडी जगह है जो अपने चाय के बगान और हिमालय की चोटियों के दृश्य के लिये प्रसिद्ध है। चाय के बगान तो अब सिर्फ नाम मात्र को रह गये हैं और मौसम की वजह से हिमालय के हिमाच्छादित शिखर भी हमें नहीं दिखे। परन्तु फिर भी बारिश होने की वजह से ठीक ठाक ठंड हो गयी थी। पास ही में एक कस्तूरा मृग (Musk Deer) अनुसंधान केन्द्र है जो शाम को साढ़े तीन बजे तक खुला रहता है। जाने के लिये करीब 2 ढाई किमी का चढ़ाईदार रास्ता है। यह अनुसंधान केन्द्र कम और संरक्षण क्षेत्र अधिक है।
कस्तूरा मृग अनुसंधान केन्द्र जाने का मार्ग

कस्तूरा मृग अनुसंधान केन्द्र जाने का मार्ग

इसमें हिमालय से लाये गये करीब 15 कस्तूरा मृग हैं जिनसे सितम्बर-अक्टूबर में कस्तूरी (Musk) निकाला जाता है। एक नर मृग से एक बार में 10 से 20 ग्राम तक कस्तूरी निकलता है। आजकल मृगों की यह प्रजाति लुप्तप्राय है और हिमालय के बर्फीले इलाकों में कभी कभार ही दिखाई देता है। यहाँ पर फोटोग्राफी निषिद्ध थी इसलिये हमें अपनी आँखों से ही कस्तूरी मृगों को देखकर सन्तुष्ट होना पड़ा। यहाँ पर कुछ देर हमने एक संरक्षक से भी बात की जिन्होंने हमें इन मृगों और उनके रखरखाव के बारे में और कई जानकारियाँ दीं।
चौकोड़ी चाय बगान और पर्यटक आवास गृह

चौकोड़ी चाय बगान और पर्यटक आवास गृह

यहाँ से लौटकर हमलोग बचे खुचे चाय बगान देखने गये। ये चाय बगान अंग्रेजों ने यहाँ लगाये थे परन्तु बहुत कम क्षेत्र में होने के कारण इनका व्यवसायीकरण नहीं हो पाया और आज ये महज एक दर्शनीय स्थल बन कर रह गये हैं। बहरहाल यहाँ से भी घाटी का मनोरम दृश्य देखने को मिलता है। चाय बगान के पीछे देवदार के जंगल हैं जिनके पीछे से घने काले बादल आते देख हमने तुरंत अपने आवास स्थल का रूख किया, फिर भी आते आते बूँदा- बाँदी शुरु हो गयी थी। चौकोड़ी मे स्थित कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के गेस्ट हाउस में एक दो मंजिला मचान भी है जहाँ से नजारा लिया जा सकता है। मैने वहाँ जाकर बी एस एन एल के फुल सिग्नल से घर पर बात की। :)

पाँचवाँ दिन: चौकोड़ी से लोहाघाट (लगभग 120 किमी)

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर के निकट

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर के निकट

चौकोड़ी से करीब 40 किमी दूर पाताल भुवनेश्वर नामक एक गुफा मन्दिर है। नास्तिकों के लिये भी यहाँ जाना उतना ही रोमांचक और सुखद है जितना कि आस्तिकों के लिये। किंवदन्ती है कि यहाँ पर पाण्डवों ने तपस्या की और कलियुग में आदि शंकराचार्य ने इसे पुनः खोजा। इस गुफा में प्रवेश का एक संकरा रास्ता है जो कि करीब 100 फीट नीचे जाता है। नीचे एक दूसरे से जुड़ी कई गुफायें है जिन पर पानी रिसने के कारण विभिन्न आकृतियाँ बन गयी है जिनकी तुलना वहाँ के पुजारी अनेकों देवी देवताओं से करते हैं।
हाट कालिका मंदिर

हाट कालिका मंदिर

ये गुफायें पानी ने लाइम स्टोन को काटकर बनाईं हैं। गुफाओं के अन्दर प्रकाश की उचित व्यवस्था है। यह संस्‍मारक भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। यहाँ पर भी फोटोग्राफी मना थी इसलिये केवल प्रकृति के ही फोटो कैमरे में कैद किये। यहाँ से चलकर हमलोग गंगोलीहाट पहुँचे। यहाँ पर प्रसिद्ध हाट कालिका मन्दिर है जो हमारे ड्राइवर की कुल देवी भी हैं। उन्हीं के अनुरोध पर हमलोग यहाँ भी गये। यह मन्दिर कुमाऊँ रेजिमेन्ट का भी मुख्य मन्दिर है, यहाँ पर उनके द्वारा भी स्थापित कुछ स्मारक हैं।
पिथौरागढ़ जाने का पुराना मार्ग

पिथौरागढ़ जाने का पुराना मार्ग

यह भारत भर में स्थित शक्ति पीठों में से एक है और कुमाऊँ मण्डल का सबसे अधिक मान्यता वाला मन्दिर है। गंगोलीहाट से चलकर रामेश्वर होते हुये हमलोग घाट पहुँचे यहाँ से पिथौरागढ़ के लिये रास्ता अलग होता है। ड्राईवर साहब ने हमें पुराना झूलापुल भी दिखाया जिससे पुराने जमाने में लोग पैदल पिथौरागढ़ जाया करते थे। यहाँ से लोहाघाट जाने के लिये वापस हम मुख्य मार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग 125) पर आ गये। रास्ते में काली घटाओं से लुका छिपी खेलते हुये हम लोग शाम करीब 5 बजे लोहाघाट पहुँचे। शाम को लोहाघाट बाजार में कुछ देर घूमे, लंगड़ा आम खाया और कुमाऊँ की प्रसिद्ध बाल मिठाई का भी आनन्द लिया।

छठा दिन: लोहाघाट से खटीमा (लगभग 120 किमी)

बाणासुर के किले से दृश्य

बाणासुर के किले से दृश्य

लोहाघाट में सुबह उठकर सबसे पहले हम लोग बाणासुर के किले पर गये जो यहाँ से खेतीखान मार्ग पर करीब 6 किमी दूर स्थित कर्णकरायत नामक स्थान पर है। किले पर जाने किये डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है, सुबह सुबह तबियत हरी हो गयी। बाणासुर का उल्लेख महाभारत काल में आता है जिसने श्रीकृष्ण जी के पौत्र का अपहरण करके उसे यहाँ छिपा रखा था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे खोज निकाला और उसके साथ युद्ध करके उसका वध कर दिया। किले के वर्तमान अवशेष 16वीं शताब्दी में चन्द राजाओ द्वारा निर्मित हैं जिन्होने उस समय यह किला मध्यकालीन (9वीं सदी) अवशेषों पर बनाया था।
बिच्छू घास

बिच्छू घास

रास्ते भर मैं अपने साथियों को बता रहा था कि पहाड़ों में एक बिच्छू घास होती है जिसके छूने भर से अत्यधिक खुजली और जलन होने लगती है। यह घास देखने में कैसी लगती है यह मुझे ठीक से याद नहीं था। बाणासुर के किले से उतरकर कार में बैठते समय मेरा हाथ बगल की झाड़ी से स्पर्श मात्र हुआ और पता चल गया कि बिच्छू घास कैसी होती है और इसका दर्द कैसा होता है। यह अनुभव लगभग ततैया (yellow wasp) के काटने जैसा ही था। चालक महोदय ने बताया कि कोई लोहे की चीज रगड़ लीजिये जिससे थोड़ा आराम मिला।
मायावती आश्रम में

मायावती आश्रम में

यहाँ से वापस लोहाघाट लौटकर हमलोग मायावती आश्रम के लिये चल दिये जो कि लोहाघाट से करीब 9 किमी दूर देवदार के जंगलों से ढकी एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ पर राम कृष्ण मिशन का अद्वैत आश्रम और एक मिशन अस्पताल स्थित हैं। स्वामी विवेकानन्द सन 1898 में अपनी हिमालय यात्रा के दौरान यहाँ भी आये थे और उन्होने पत्रिका प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन अल्मोड़ा से यहाँ स्थानान्तरित कर दिया।यहाँ पर एक छोटा पुस्तकालय और एक संग्रहालय भी है और पुस्तक भवन है जहाँ से विवेकानन्द साहित्य की पुस्तकें खरीदी भी जा सकती हैं। मायावती से लौटकर हम लोग चम्पावत होते हुये शाम करीब 6 बजे खटीमा वापस पहुँच गये।

सातवाँ दिन: खटीमा से महेंद्रनगर (नेपाल) और वापस (लगभग 50 किमी)

भारत नेपाल सीमा पर आजाद क्षेत्र

भारत नेपाल सीमा पर घास का मैदान

क्योंकि हमारे पास अभी एक दिन और बचा था जो कि हमने बफर के तौर पर रखा था, इसलिये अन्तिम दिन हम लोगों ने पैदल विदेश यात्रा करने का निर्णय लिया। खटीमा टनकपुर मार्ग पर स्थित बनबसा से करीब 15 किमी दूर महेन्द्रनगर स्थित है जो एक समय विदेशी बाजार के कारण आकर्षण का केन्द्र बिन्दु था। मुझे याद है आज से करीब 15 साल पहले लोग वहाँ से जूते, जैकेट, इमरजेन्सी लाइट, जीन्स इत्यादि लाया करते थे। आज वैसे तो सारा सामान भारत में भी उपलब्ध है फिर भी वहाँ जाना एक दिन के लिये एक अच्छी पिकनिक है।
बनबसा डैम का मॉडल

बनबसा डैम का मॉडल

महेन्द्रनगर का रास्ता बनबसा डैम से होकर जाता जो आजादी से कुछ समय पूर्व ही बनना शुरू हुआ था। उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी नहर शारदा नहर यहीं से निकलती है पास में ही लोहियाहेड नामक स्थान पर एक जलविद्युत परियोजना भी है। डैम को पार करते ही भारतीय सीमा समाप्त हो जाती है यहीं पर भारतीय चौकी है। यहाँ से करीब 2 किमी दूर गड्डा चौकी नेपाली चेक पोस्ट है। गड्डा चौकी से महेन्द्रनगर के लिये बस चलती है।
शारदा नहर के किनारे पर थके हुये लोग :)

शारदा नहर के किनारे पर थके हुये लोग :)

हमलोग कुछ देर यहाँ के बाज़ार में घूमे, पेट भरा :) और रस्म अदायगी के लिये 15 रुपये का एक नेलकटर खरीद लिया, वैसे नेलकटर के स्वामित्व को लेकर अभी भी हमारे बीच कुछ मतभेद हैं :) । लौटते समय हमलोग गड्डा चौकी से बनबसा (6 किमी) तक पैदल ही आये बीच में डैम पर और फिर नहर के किनारे कुछ देर विश्राम किया। इस दौरान यही चिन्ता हमें खाई जा रही थी कि कल से फिर कानपुर की भीषण गर्मी झेलनी है, यह हमारे चेहरों पर साफ झलक रहा था। 9 दिनों की इस यात्रा में खाने के अतिरिक्त प्रतिव्यक्ति करीब 4 हजार रुपये का खर्च आया जिसे और कम किया जा सकता था। खैर कुल मिलाकर पूरा अनुभव अविस्मरणीय रहा।


एक सप्ताह हिमालय की गोद में… – भाग 1

July 4, 2009

इस साल पूरे उत्तर भारत और खासकर कानपुर में गर्मी ने हद ही पर कर दी थी। एक ही उपाय सुझाया इससे बचने का कि पहाड़ों में चलते हैं। नैनीताल, मसूरी और शिमला तो पहले ही घूम चुके थे और इन सभी की गर्मियों में भीड़ भाड़ के कारण बुरी हालत हो जाती है इसलिये सोचा कि थोड़ी शान्त और एकान्त जगह चलते हैं।

यात्रा मार्ग

यात्रा मार्ग

मेरा बचपन खटीमा (उस समय नैनीताल और अब उत्तराखण्ड के उधम सिंह नगर जनपद में स्थित) में बीता है और तभी से सपना था पिथौरागढ़ जाने का जो इस बार जाकर साकार हुआ। मैंनें और तीन सहपाठियों अनुपम, विकास और टोनी को अपने साथ चलने को तैयार किया और 20 जून की शाम को कानपुर से निकल पड़े। पिथौरागढ़ जाने के दो रास्ते हैं एक हल्द्वानी से अल्मोड़ा बागेश्वर होते हुये और दूसरा खटीमा से चम्पावत होते हुये। इतनी आसान सी बात को समझने में विकास को काफ़ी दिक्कत हुई पर अन्त में समझ आ ही गया। :) खटीमा में कुछ पुराने मित्रों की सहायता से टैक्सी (मारुति वैगेनार) बुक हो गयी और 22 जून की सुबह खटीमा से चलना तय हुआ। कानपुर से खटीमा जाने के लिये सबसे उपयुक्त ट्रेन नैनीताल एक्स्प्रेस (लखनऊ से खटीमा) में रिज़र्वेशन न मिल पाने के कारण हमलोग बरेली तक ट्रेन से गये और फिर वहाँ से बस लेकर 21 जून की सुबह करीब 8 बजे खटीमा पहुँच गये।
नानक सागर

नानक सागर

पहला दिन हम लोगों ने नानकमत्ता जाने के अलावा अपनी सारी ऊर्जा को आराम करके संचित करने में बिताया। नानकमत्ता में सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी आये थे और आज वहाँ एक काफ़ी बड़ा गुरुद्वारा है। पास में ही नानकसागर है जो कि कुछ छोटी नदियों और बरसात में पानी को एकत्रित करके वर्ष भर कई नदी और नहरों के माध्यम में सिंचाई में प्रयुक्त होता है। इससे निकलने वाली सबसे प्रमुख नदी देवहा है जो आगे चलकर गोमती में मिलती है। शाम को मैंने खटीमा की कुछ पुरानी यादें ताजा की और मित्रों ईश्वर (जिसने हमारे लिये सारा इन्तजाम करवाया) और गोपाल के साथ कुछ समय बिताया।

पहला दिन: खटीमा से पिथौरागढ़ (लगभग 160 किमी)

सुबह करीब 7 बजे हमलोग हिमालय की सैर के लिये खटीमा से रवाना हुये। राष्ट्रीय राजमार्ग 125, जो टनकपुर से तवाघाट तक जाता है, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन द्वारा संचालित होने के कारण अन्य पहाड़ी सड़कों की तुलना में काफ़ी अच्छा है। हमें केवल सूखीढाँग के पास ही करीब 5 किमी का खराब टुकड़ा मिला।

श्यामलाताल

श्यामलाताल

सूखीढाँग से मुख्य मार्ग से करीब 5 किमी की दूरी पर श्यामलाताल स्थित है जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई करीब 1520 मी है। यहाँ पर विवेकानन्द आश्रम के अतिरिक्त एक छोटा ताल है जो कि हमें गर्मी का मौसम होने के कारण और भी छोटी स्थिति में मिला। यहाँ पर चाय और थोड़ी देर के विश्राम के बाद हम लोग चम्पावत के लिये निकल पड़े। चम्पावत होते हुये करीब तीन घंटे में हम लोग लोहाघाट पहुँच गये।
एबट माउन्ट

एबट माउन्ट

यहाँ थोड़ा रुककर हमने दोपहर का भोजन लिया और पास ही में स्थित एक चोटी एबट माउन्ट के लिये चल पड़े। सड़क का रास्ता करीब 9 किमी का है जबकि पैदल का रास्ता 4 किमी लम्बा है। एबट माउन्ट समुद्र तल से 2130 मी की ऊँचाई पर स्थित लोहाघाट के आसपास का सबसे ऊँचा स्थान है। इस चोटी की खोज ब्रिटिश इंडिया में झाँसी के जॉन हेरॉल्ड एबट ने 1914 में की थी। देवदार और ओक के पेड़ों से भरपूर इस चोटी से वृहद हिमालय की कई बर्फ़ीली चोटियों के साथ घाटी का विहंगम दृश्य मिलता है।
चण्डाक से पिथौरागढ़ का दृश्य

चण्डाक से पिथौरागढ़ का दृश्य

मौसम साफ़ न होने के कारण हम लोगों को बहुत अच्छा दृश्य तो देखने को नहीं मिला परन्तु ठंडी हवाओं के बीच वहाँ के दृश्य स्थल पर बैठना अपने आप में बहुत सुखदायी था। यहाँ पर जीर्णावस्था में एक चर्च भी है जो देखने लायक है। एबट माउन्ट से करीब डेढ़ बजे हम लोग पिथौरागढ़ के लिये चल पड़े। घाट होते हुये करीब चार बजे हम लोग पिथौरागढ़ पहुँच गये। अपना सामान कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह में रखकर हमलोग यहाँ से 6 किमी दूर स्थित चोटी चण्डाक पर गये। यहाँ से पूरे पिथौरागढ़ का दृश्य देखने को मिलता है और यदि आसमान साफ हो तो हिमालय की चोटियाँ भी दिखाई देती हैं।

दूसरा दिन: पिथौरागढ़ से मुनश्यारी (लगभग 120 किमी)

पिथौरागढ़ से मुनश्यारी करीब 120 किमी दूर है परन्तु संकरी सड़क और टेढ़े-मेढ़े मार्ग के कारण 6-7 घंटे लग जाते हैं। रास्ते में बहुत से ऐसे स्थान आते हैं जहाँ से पहाड़ियों, घाटियों और नदियों का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।

रामगंगा

रामगंगा

पिथौरागढ़ से मुनश्यारी के दो रास्ते हैं। एक देवल थल, थल, तेजाम, गिरगाँव होते हुये और दूसरा ओग्ला, अस्कोट, जौलजीबी और मडकोट होककर। पहला मार्ग करीब 30 किमी छोटा पड़ता है, जबकि यदि अस्कोट में कस्तूरी मृग संरक्षित उद्यान देखते हुये जाना हो तो दूसरा मार्ग उचित है। हमने प्रथम मार्ग चुना क्योंकि अस्कोट कम ऊँचाई पर होने के कारण गर्मियों में गर्म हो जाता है और ऐसे में जानवर भी ठंडी जगहों में छुपे रहते हैं।
बिर्थी झरना

बिर्थी झरना

देवलथल के आहे से थल तक करीब 7-8 किमी का रास्ता रामगंगा नदी के किनारे किनारे जाता है और दो पहाड़ियों के मध्य पथरीले रास्ते से बहता नदी का निर्मल जल देखते ही बनता है। यहाँ पर कुछ देर के लिये हमलोग रुककर नदी के पानी तक भी गये। थल के आगे फिर से चढ़ाई शुरु हो जाती है और तेजाम आने के बाद सामने पहाड़ी पर बहुत दूर और ऊपर कुछ झरने सा दिखाई देता है। अगले करीब आधे घंटे तक हम लोग इसी बात पर बहस करते रहे कि यह बिर्थी झरना है या नहीं और अगर है तो वहाँ तक पहुँचना संभव है नहीं।
मुनश्यारी मार्ग में एक दृश्य

मुनश्यारी मार्ग में एक दृश्य

आखिरकार ये बिर्थी झरना ही निकला और दो ऊँची पहाड़ियों को जोड़ने वाले दो पुलों की सहायता से हम लोग बिर्थी झरने के निकट पहुँच गये। सड़क से झरने तक जाने के लिये करीब 300 मीटर की खड़ी चढ़ाई थी झरने को पास से देखने की उत्सुकता में हाँफते हुये झरने के पास पहुँचे तो उसमें नहाये बिना रहा न गया। वहाँ मौजूद कुछ अन्य लोगों ने हमारी सहायता की और बताया कि कौन कौन से पत्थर फिसलन युक्त हैं और उन पर कैसे सावधानी पूर्वक चला जाय। ठंडे पानी ने सारी थकान मिटा दी। नहाने के बाद पानी में हमें कुछ जोंक, मेढक और एक साँप के दर्शन हुये, जो अगर पहले दिख जाता तो शायद नहाने की जुर्रत नहीं करते।
जोहर घाटी

जोहर घाटी

हममें से एक को करीब 3 फुट लम्बी गोह भी दिखी वहाँ पर। उसके बाद हमलोग गिरगाँव, रातापानी होते हुये मुनश्यारी पहुँच गये। यहाँ भी हमने कुमाऊँ मण्डल विकास निगम का पर्यटक आवास गृह ही रुकने के लिये चुना। शाम को हम लोग पास में ही स्थित नंदा देवी मंदिर गये यह मुनश्यारी के एक ओर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है और यहाँ से जोहर घाटी और उसके पार हिमालय की गगन चुम्बी चोटियाँ दिखाई देती हैं, जिसमें सबसे प्रमुख पंचचुली है। परन्तु मौसम ने यहाँ भी हमें निराश किया और हमें घाटी और हिमालय की प्रथम श्रेणी को देखकर ही संतुष्ट होना पड़ा।

तीसरा दिन: मुनश्यारी में

तीसरा दिन यात्रा का सबसे रोचक दिन था। इसके कई कारण थे; पहला तो हमने इस दिन कहीं की भी यात्रा नहीं की पूरा दिन मुनश्यारी के आस पास की जगहों पर ही जा कर बिताया, दूसरा इस दिन हमलोग करीब 12 किमी पैदल चले वो भी पहाड़ी रास्तों पे, तीसरा और सबसे मुख्य इस दिन हमें पहाड़ी महिलाओं के अग्रणी और उदारवादी होने का जीवंत उदाहरण मिला :) (आगे पढ़िये)।

महेश्वरी कुण्ड का मार्ग

महेश्वरी कुण्ड का मार्ग

प्रातः नाश्ते से पहले हम लोग एक बार फिर से नंदा देवी मंदिर के पास गये और पिछले दिन के बचे हुये कुछ जगहों पर उतर कर गये। दो ढाई किमी की कसरत तो वहीं हो गयी। जलपान के बाद हनलोग पास में स्थित एक पहाड़ी तालाब (alpine lake) माहेश्वरी कुण्ड (या महेसर कुण्ड) देखने गये। माहेश्वरी कुण्ड जाने के लिये करीब 2 किमी की चढ़ाई है, यहाँ से भी मुनश्यारी और जोहर घाटी के दृश्य के साथ हिमालय की चोटियाँ दिखती हैं। ऊपर एक छोटा कुण्ड है जिसमें मुख्यतः बरसाती पानी ही एकत्रित होता है। कुछ देर हम लोग वहाँ बैठे तो कुछ शरारती बालकों ने आकर हमें बताया कि ये मुख्य कुण्ड नहीं है बल्कि आगे है।
माहेश्वरी कुण्ड

माहेश्वरी कुण्ड

पहले तो हमें यकीन नहीं हुआ। पर थोड़ी जाँच पड़ताल के बाद हम लोग आगे बढ़े तो वाकई वहाँ एक और कुण्ड था पर उसमें पानी कम और शैवाल अधिक उगे हुये थे। यहाँ अनुपम ने अपने चापू डी एस एल आर कैमरे से कुछ नेशनल ज्योग्राफिक वाले फोटो खींचे और हम लोगों ने पेड़ की घनी छाया में सूखी काई लगे पत्थर पर बैठकर आराम किया। उसके बाद हम लोगों ने कुछ समय पहले वाले कुण्ड के निकट घास के मैदान में भी बिताया। (कहानी में ट्विस्ट :) ) यहीं पर कुछ पहाड़ी महिलायें भी कुछ दूरी पर बैठ कर सुस्ता रहीं थीं, वे सब वहाँ से रेता-बजरी ले जाने के लिये आई हुयी थीं।
पुराना माहेश्वरी कुण्ड

पुराना माहेश्वरी कुण्ड

शायद उन्होंने हम लोगों को देखा होगा क्योंकि हमारे अलावा वहाँ पर कोई अन्य पर्यटक नहीं था। हम लोग विकास के साथ कुछ मजाक कर रहे थे। वापस लौटते समय हमनें देखा कि एक जगह पर छाया में वही महिलाये बैठी हुयीं है, जो कि रेता-बजरी नीचे ले जा रही थी और रास्ते में कुछ देर विश्राम कर रहीं थीं। एक एक कर करके टोनी, अनुपम और मैं आगे निकल गये। विकास जिसे ऊँचाई से डर भी लगता है आहिस्ता आहिस्ता उतर रहा था इसलिये पीछे रह गया। जब वह महिलाओं के समीप आया तो उनमें से एक ने उससे पूछा, “आप पीछे रह गये… चला नहीं जा रहा क्या?” विकास ने कहा “नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।” और इतना कहकर तेजी से नीचे उतरने लगा। जब हमारे पास पहुँचा तो हमने पूछा कि क्या हुआ तो उसने बताया कि वो सब छेड़ने को हो रहीं थीं। :) जो भी हो इससे एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि पहाड़ी महिलायें अग्रणी और उदारवादी विचारों वाली होती हैं। यदि आपने कभी पहाड़ी जीवनचर्या पर गौर किया हो तो आप ने अवश्य देखा होगा कि वहाँ पर महिलाये पुरुषों से अधिक शारीरिक श्रम और घर के बाहर के काम करती हैं। शाम के समय हम लोग ज़ारा रिसोर्ट के ऊपर वाली पहाड़ी पर भी गये और तेज हवा के झोकों में हवाई कलाबाजी करते पक्षियों के साथ कुछ समय बिताया।

अगले भाग में शेष तीन दिनों का लेखा जोखा …


बात करनी मुझे मुशकिल कभी ऐसी तो न थी…

June 18, 2009

स्वर:मेंहदी हसन
रचना: बहादुर शाह ज़फ़र


सरफ़रोशी की तमन्ना (गुलाल)

March 27, 2009

हाल में ही प्रदर्शित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म गुलाल का संगीत काफ़ी प्रभावशाली है। आज के दौर पर कटाक्ष ये छोटा सा छन्द जोकि बिस्मिल के “सरफ़रोशी की तमन्ना” का एक्स्टेंशन है, मुझे बहुत अच्छा लगा। आप भी सुनिये -

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ
देखते कि मुल्क़ सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गये
अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के तिल में है

आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्ढी भी सिलती इंगलिसों की मिल में है