कुछ चुनिंदा रचनाएँ

October 27, 2007

प्रस्तुत हैं मेरे कविता संग्रह से चुनित कुछ प्रसिद्ध कवियों की कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ| आशा है की आप लोगों को ये कुछ सोचने पर मजबूर अवश्य करेंगी|

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार;
पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार|
भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम;
बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम|
लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञानं का श्रम व्यर्थ|
यह मनुज, जो ज्ञान का आगार;
यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार |
छद्म इसकी कल्पना, पाखण्ड इसका ज्ञान;
यह मनुष्य, मनुष्यता का घोरतम अपमान|
- रामधारी सिंह ‘दिनकर’

कहाँ नश्वर जगत में शांति , सृष्टि ही का तात्पर्य अशांति |
जगत अविरत जीवन संग्राम, स्वप्न है यहाँ विराम |
यही तो है असार संसार, सृजन सिंचन संहार |
- सुमित्रा नन्दन पंत

दीप से जलना न सीखो, दीप से मुस्कान सीखो;
सूर्य से ढलना न सीखो, सूर्य से उत्थान सीखो |
अपनी मजबूरी पे, अश्क बहाने वाले राही;
राह चलना ही न सीखो, राह का निर्माण सीखो|
- अज्ञात (यदि आपको पता हो तो अवश्य बताएँ)


नैनोटेकनोलॉजी: एक नया विषय

October 26, 2007

नैनोटेकनोलॉजी को अलग विषय के रूप में अध्ययन करने की क्या आवश्यकता है?
२० वीं शताब्दी तक हमने भौतिकी तथा रासायनिक विज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रगति कर ली थी| दैनिक जीवन में होने वाले अनेक प्रक्रमों की विस्तार में व्याख्या भौतिकी के नियमों से करी गयी| परन्तु सूक्ष्म प्रक्रमों के अध्ययन में एक समस्या सामने आयी कि इतने छोटे पैमाने पर गुरुत्वीय बल की तुलना में अन्य अंतराणविक बल अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं| अतः सूक्ष्म विज्ञान के अध्ययन हेतु हमें पुनः नए सिरे से एक सिद्धांत विकसित करने की आवश्यकता पड़ी| इसी विधा को नैनोटेकनोलॉजी या अतिसूक्ष्म विज्ञान का नाम दिया गया है| इसे थोड़ा और अच्छी तरह से समझने के लिए एक कांच की नली में पानी के बहाव का उदाहरण लेते हैं| यदि नली में पानी को नीचे से ऊपर ले जाना है तो हमें नीचे से दबाव लगाना पड़ेगा जैसा कि एक पम्प करता है | परन्तु यदि हम इसी नली का व्यास काफ़ी कम कर दें तो केशिकात्व के प्रभाव से पानी स्वतः ही कुछ ऊंचाई तक चढ़ जाता है| ऐसा पानी व कांच के अणुओं के बीच लगने वाले आसंजक बल के कारण होता है| अतः सूक्ष्म नलियों में प्रवाह की रूपरेखण हेतु इन सभी तथ्यों पर प्रकाश डालने की आवश्यकता पड़ती है|


हम अंतराग्नि क्यों मनाते हैं?

October 25, 2007

कल से आई.आई.टी. कानपुर का साढ़े तीन दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव ‘अंतराग्नि’ प्रारम्भ हुआ| जहन में एक सवाल आया कि आख़िर हम अंतराग्नि क्यों मनाते हैं? थोड़े विचारमंथन के बाद समझ आया कि यहाँ आई.आई.टी. में स्त्री-पुरूष लिङ्गानुपात १/१० से भी कम है, इस प्रताड़ना के पीछे आख़िर हमारा दोष ही क्या है? यही कि बचपन में हमने पढ़ाई-लिखाई में थोड़ा अधिक मन लगाया था या फिर कि हमने जीवविज्ञान जैसे रटने वाले विषय से ज्यादा प्रमुखता गणित को दी| आख़िर हमारे मन में भी यश चोपड़ा के चलचित्र देखकर कुछ कुछ होता है और यदि ऐसे कुछ उत्सव हमारी कुछ संभावनाओं को बढ़ा दें तो हर्ज़ ही क्या है? गत पाँच वर्षों में हमने इसी उत्सव में कई छोटी सी लव स्टोरीस देखीं, सफल तो शायद कोई न हो सका पर थोड़े समय की सफलता को भी सफलता ही कहा जाएगा| बी.टेक. के समय हमने एक फोसला नामक संगठन का नाम सुना था| ज्ञातव्य हो कि फोसला (FOSLA) का पूर्ण रूप है फ्रस्टेटेड वन साइडेड लवर्स एसोसिएसन है और यह संगठन भारत में लगभग सभी संस्थानों में (मुख्यतः ईंजीनिअरिंग) पाया जाता है| यहाँ भी आप इसके सदस्यों को अंतराग्नि के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम डिस्कोथेक के मुख्य द्वार के बाहर लम्बी कतारों में खड़ा पा सकते हैं| डिस्कोथेक प्रांगण में प्रवेश हेतु इन लोगों का धैर्य देखने योग्य होता है| घंटों तक कतार में खड़े रहने के बाद जब कुछ बालाओं को अपने साथियों के साथ डिस्को करता हुआ देख लेते हैं तो सारी थकान दूर हो जाती है| भारतीय दर्शन का इससे अच्छा उदाहरण क्या होगा? पर सुखे सुखम्| इसके अतिरिक्त अंतराग्नि के कुछ और भी फ़ायदे हैं| पता चलता है कि समाज किस ओर अग्रसर है तथा आजकल फैशन में क्या है| हमें वास्तविकता का एहसास कराता है, यह भी याद दिलाता है कि आई.आई.टी. में आकर कितनी बड़ी भूल हो गयी है और यथाशीघ्र यहाँ से अपना प्रोग्राम ख़त्म करके निकलो|

आप सोच रहे होंगे कि अभी तक मैंने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के तथाकथित मुख्य उद्देश्य, संस्कृति व कला के प्रोत्साहन का तो उल्लेख किया ही नहीं| परन्तु यह वास्तविकता है कि संस्कृति व कला को न तो आयोजकों ने और न ही भाग लेने वालों ने प्रथम वरीयता दी है| उदाहरण के लिए नाट्यस्पंदन, सुर (गायन) और नटराज (नृत्य स्पर्धा) जैसे कार्यक्रम सबसे कम लोकप्रिय हैं जबकि ऋतम्भरा (फैशन शो), डिस्कोथेक व ब्लाइंड डेट जैसे कार्यक्रम काफी लोकप्रिय रहते हैं| यदि आप एक पेशेवर कलाकार के कार्यक्रम की लोकप्रियता को कला का प्रोत्साहन कहना चाहें तो मेरी नजरों में यह कला का नहीं बल्कि स्टारडम का क्रेज़ है| खैर सही भी है आज जब टीवी, फिल्मों और मीडिया वालों को संस्कृति व कला की परवाह नहीं है तो क्या हमीं ने ठेका उठाया है इसका?

अंतराग्नि की आधिकारिक वेब साइट: http://antaragni.iitk.ac.in/


हमारी पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा

October 24, 2007

विगत सप्ताह नीरज के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ| नीरज एक माह के लिए ह्यूस्टन से भारत आया हुआ है| जब उसने इस यात्रा का प्रस्ताव रखा तो मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया| १९ अक्टूबर शुक्रवार को प्रातः ६ बजे नीरज कानपुर पहुँचा| दिनभर मैंने उसे आई. आई. टी. तथा अपनी प्रयोगशाला का भ्रमण कराया| आश्चर्यजनक रूप से उसे हमारी मेस का भोजन काफी पसंद आया| सायंकाल हम लोग अनूप जी के साथ उनके अरमापुर स्थित आवास पर गए| अनूप जी के साथ कई विषयों पर चर्चा हुई जिनमे से साम्यवाद तथा आई. आई. टी. का इन्फोठेला प्रमुख थे| उन्होंने मुझे राग दरबारी व नीरज को हिन्दी पुस्तक भेंट की| मुझे भी ब्लॉग जगत में पदार्पण करने हेतु काफी कुरेदा गया|

नीरज और मैं अनूप जी के घर पर

रात्रि साढ़े ग्यारह बजे हमने रेलवे स्टेशन की ओर कूच किया| शिव गंगा एक्सप्रेस करीब एक घंटा विलम्ब से आई परन्तु हमने समय कुछ ऐसा काटा कि पता नहीं चला| खैर प्रातः ९ बजे हम बनारस पहुंचे| थोड़ी जद्दोजहद के बाद एक होटल में कमरा लिया और तरोताजा होने के बाद सारनाथ की ओर प्रस्थान किया| सारनाथ में हम मंदिरों के अतिरिक्त संग्रहालय भी गए| नीरज भारत सरकार के द्वारा किए गए संरक्षण प्रबंधों से काफी प्रभावित हुआ और बोला कि हम लोग बेवजह ही सरकार कि हर बात पर निंदा किया करते हैं|

नीरज सारनाथ स्तूप के सामने

अपराह्न में हम काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बी. एच. यू.) गए और काशी विश्वनाथ मन्दिर में दर्शन के पश्चात् अपने पूर्व शिक्षक श्री राम शरण सिंह से भी मिले| सर के साथ करीब डेढ़ घंटे तक हमने विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श किया| सर ने हमें रात्रिभोज पर आमंत्रित किया जिसका हमने भारत व आस्ट्रेलिया के बीच ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैच के साथ आनंद लिया| इससे पहले सायंकाल हमने अस्सी घाट से दशाशमेघ घाट तक नौका विहार का आनंद भी लिया|

मैं और सर

अगले दिन प्रातः ही हमने इलाहाबाद कि ओर चढा़ई कर दी| प्रातः अल्लापुर स्थित मामा जी के आवास पर नाश्ता करने के पश्चात् हम नीरज के अंकल जी के साथ संगम नहाने गए| नीरज के अंकल जी दरअसल एक रोचक व्यक्तित्व निकले| जीवन के अनेक पहलुओं पर हमने उनके विचार सुने| उन्होंने हमें ब्रह्म विवाह, अष्टावक्र गीता, स्वस्थ जीवन शैली इत्यादी के बारे में बताया| उनकी सभी बातों से मैं सहमत था यह तो नहीं कहूँगा परन्तु हिंदुत्व के बारे में काफी जानने को मिला|

नीरज के अंकल जी

संगम स्नान के बाद हम मुग़ल सम्राट अकबर के किले में स्थित अक्षयवट देखने गए| इस वृक्ष का मुख्य भाग अब किले के सेना अधीन क्षेत्र में है जो कि आम नागरिकों के लिए निषिद्ध है| कहते हैं आदिकाल में जब जलप्रलय आई थी तब इसी अक्षयवट के सहारे ही कुछ लोग बच पाये थे| खैर प्रलय तो क्या गंगा में भीषण बाढ़ आयी होगी| सायंकाल हम लोग शिवकुटी स्थित ज्ञानदत्त पांडे जी के आवास गए| थोड़ी मशक्कत और कुछ फोन कॉल्स के फलस्वरूप हमने ज्ञानदत्त जी का घर ढूंढ़ निकाला| उनसे हमने रेलवे से संबंधित कई शंकाओं का समाधान किया | उन्होंने रेलवे-लालू किस्से पर भी प्रकाश डाला| वे हमारे शोध कार्य के बारे में जानने के लिए भी काफी उत्सुक थे | नीरज ने उन्हें गैस हाईड्रेट्स के बारे में बताया तो उन्होंने काफी दिलचस्पी दिखाई|

नीरज और ज्ञानदत्त पांडे जी

रात में हम इलाहाबाद-मथुरा एक्सप्रेस से वापस कानपुर लौट आए| अंततः हमारी तीन दिवसीय थकान भरी पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा समाप्त हुई |


ये नैनोटेकनोलॉजी है क्या भइया ?

October 23, 2007

नवीं कक्षा में संभवतः सभी विज्ञान और गैरविज्ञान छात्रों को पढ़ाया गया था कि इकाई के अरबवें हिस्से को नैनो कहा जाता है| तब तो बस रट लिया था, बाद में जब बड़े हुए तो पता चला कि नैनोटेकनोलॉजी नामक विधा का आजकल बहुत बोलबाला चल रहा है| दरअसल यह सब शुरू हुआ जब हमने रसायन अभियांत्रिकी (Chemical Engineering) में बी. टेक. की डिग्री प्राप्त  करने के पश्चात् जुलाई २००२ में आई. आई. टी. कानपुर में पदार्थ विज्ञान (Materials Science) विभाग में प्रवेश लिया| शिक्षकों तथा सहपाठियों ने बताया कि आजकल यही उदीयमान क्षेत्र (growing field) है और यदि इसमें उच्च शिक्षा ग्रहण कर लो तो भविष्य काफी उज्ज्वल है| हमने सोचा पहले देखें तो कि ये नैनोटेकनोलॉजी है क्या बला? खैर कुछ समय इंटरनेट पर बिताने के पश्चात् थोड़ा बहुत समझ में आया, फिर एक कोर्स किया इन्ट्रोडक्शन टु नैनोसाइंस एंड नैनोटेकनोलॉजी जिसमें काफी फंडे क्लिअर हुए| धीरे-धीरे समय बीता, हमने इस विषय को थोड़ा और छाना और इसी विधा में पी-एच. डी. करने का निर्णय ले लिया| पिछले दो-ढाई सालों में अनेकों पढ़े लिखे व अनपढ़ लोगों ने हमसे जानना चाहा कि आख़िर हम कर क्या रहे हैं और ऐसी कौन सी पढ़ाई जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती? परन्तु हम सभी को एक सटीक उत्तर देने में सफल न हो पाये| शायद पहले कभी बैठकर एक बार मनन नहीं किया था| पिता जी ने भी एक बार बोला कि उनके महाविद्यालय की पत्रिका के लिए एक लेख लिख दो जो कि एक आम आदमी को नैनोटेकनोलॉजी के बारे में समझा सके| पर हमने अपना पल्लू झाड़ते हुए बोल दिया कि हिन्दी में तो हो नहीं पायेगा और अंग्रेजी में जो आर्टिकल हमने दिया वो ज़्यादातर लोगों की समझ से परे था| खैर अब मैंने निश्चय किया है कि इस ब्लॉग के माध्यम से नैनोटेकनोलॉजी से जुड़े कुछ पहलुओं तथा कुछ भ्रांतियों के उत्तर देने का प्रयत्न करूंगा|

नैनोटेकनोलॉजी का तात्पर्य नैनोमीटर में होने वाली किसी भी क्रिया मात्र से नहीं हैं -
नैनोटेकनोलॉजी के बारे में सर्वाधिक प्रचलित भ्रांतियों में से एक है कि नैनोमीटर में होने वाली सभी क्रियायें नैनोटेकनोलॉजी के अंतर्गत आती हैं जो कि वास्तविकता से कोसों दूर है | दरअस्ल जब हम किसी वस्तु का आकार छोटा करते जाते हैं तो एक आकार के बाद उसके किसी विशेष गुण जैसे कि रंग, चुम्बकीयता, वैद्युत अथवा रासायनिक गुणों में अनियमित बदलाव देखने को मिलता है यदि इसी अनियमितता का प्रयोग करते हुए एक टेकनोलॉजी विकसित की जाती है तो उसे नैनोटेकनोलॉजी कह सकते हैं | लघुरूपण (miniaturization) मात्र ही नैनोटेकनोलॉजी नहीं है |

सही है मान लिया, परन्तु आकार छोटा करने पर अनियमित बदलाव क्यों होता है?
किसी भी वस्तु में पृष्ठ या सतह पर स्थित अणु भीतरी अणुओं से भिन्न होते हैं| पृष्ठ अणु भीतरी अणुओं से अधिक क्रियाशील होते हैं| इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि जैसे किसी देश की सीमा रेखा पर उग्र सिपाही होते हैं जबकि उसके अतिरिक्त देश में साधारणतया शांतिप्रिय नागरिक रहते हैं| जब हम वस्तु का आकार छोटा करते जाते हैं तो भीतरी अणुओं की तुलना में पृष्ठ अणुओं की संख्या बढ़ती जाती है और एक आकार के पश्चात् वस्तु के गुणों का नियंत्रण पृष्ठ अणुओं के पास आ जाता है| यह क्रान्तिक आकार (critical size) विभिन्न गुणों तथा पदार्थों के लिए अलग - अलग होता है| उदाहरण के लिए एक घनाकार वस्तु लेते हैं जिसकी एक भुजा कि लम्बाई ‘क’ है | इसका पृष्ठ क्षेत्रफल ६.क होगा तथा आयतन क| यदि पृष्ठ क्षेत्र व आयतन का अनुपात लें तो / आयेगा, अर्थात् जैसे -जैसे हम ‘क’ को छोटा करते जायेंगे यह अनुपात बढ़ता रहेगा|

अच्छा ये पृष्ठ अणु भीतरी अणुओं से भिन्न क्यों होते हैं?
भीतरी अणुओं के सभी ओर समान अणु रहते हैं जिससे उनमें एक संतुलन बना रहता है जो कि उन्हें स्थायित्व प्रदान करता है| इसके विपरीत सतह पर स्थित अणुओं के एक ओर पदार्थ तो दूसरी ओर शून्य या वायु रहती है; इस कारणवश उनका संतुलन नहीं बन पाता और इसी संतुलन को बनाने के लिए वे ज्यादा क्रियाशील रहते हैं|

इस दिशा में निकट भविष्य में मेरे द्वारा संभावित पोस्ट निम्नलिखित हैं -

  • नैनोटेकनोलॉजी को अलग विषय के रूप में अध्ययन करने की क्या आवश्यकता है?
  • नैनोटेकनोलॉजी : उम्मीदें और विश्वास
  • प्रकृति से सीख : नैनो-बायोटेकनोलॉजी
  • नैनोटेकनोलॉजी : कितनी वास्तविकता कितना पाखंड