नवीं कक्षा में संभवतः सभी विज्ञान और गैरविज्ञान छात्रों को पढ़ाया गया था कि इकाई के अरबवें हिस्से को नैनो कहा जाता है| तब तो बस रट लिया था, बाद में जब बड़े हुए तो पता चला कि नैनोटेकनोलॉजी नामक विधा का आजकल बहुत बोलबाला चल रहा है| दरअसल यह सब शुरू हुआ जब हमने रसायन अभियांत्रिकी (Chemical Engineering) में बी. टेक. की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात् जुलाई २००२ में आई. आई. टी. कानपुर में पदार्थ विज्ञान (Materials Science) विभाग में प्रवेश लिया| शिक्षकों तथा सहपाठियों ने बताया कि आजकल यही उदीयमान क्षेत्र (growing field) है और यदि इसमें उच्च शिक्षा ग्रहण कर लो तो भविष्य काफी उज्ज्वल है| हमने सोचा पहले देखें तो कि ये नैनोटेकनोलॉजी है क्या बला? खैर कुछ समय इंटरनेट पर बिताने के पश्चात् थोड़ा बहुत समझ में आया, फिर एक कोर्स किया इन्ट्रोडक्शन टु नैनोसाइंस एंड नैनोटेकनोलॉजी जिसमें काफी फंडे क्लिअर हुए| धीरे-धीरे समय बीता, हमने इस विषय को थोड़ा और छाना और इसी विधा में पी-एच. डी. करने का निर्णय ले लिया| पिछले दो-ढाई सालों में अनेकों पढ़े लिखे व अनपढ़ लोगों ने हमसे जानना चाहा कि आख़िर हम कर क्या रहे हैं और ऐसी कौन सी पढ़ाई जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती? परन्तु हम सभी को एक सटीक उत्तर देने में सफल न हो पाये| शायद पहले कभी बैठकर एक बार मनन नहीं किया था| पिता जी ने भी एक बार बोला कि उनके महाविद्यालय की पत्रिका के लिए एक लेख लिख दो जो कि एक आम आदमी को नैनोटेकनोलॉजी के बारे में समझा सके| पर हमने अपना पल्लू झाड़ते हुए बोल दिया कि हिन्दी में तो हो नहीं पायेगा और अंग्रेजी में जो आर्टिकल हमने दिया वो ज़्यादातर लोगों की समझ से परे था| खैर अब मैंने निश्चय किया है कि इस ब्लॉग के माध्यम से नैनोटेकनोलॉजी से जुड़े कुछ पहलुओं तथा कुछ भ्रांतियों के उत्तर देने का प्रयत्न करूंगा|
नैनोटेकनोलॉजी का तात्पर्य नैनोमीटर में होने वाली किसी भी क्रिया मात्र से नहीं हैं -
नैनोटेकनोलॉजी के बारे में सर्वाधिक प्रचलित भ्रांतियों में से एक है कि नैनोमीटर में होने वाली सभी क्रियायें नैनोटेकनोलॉजी के अंतर्गत आती हैं जो कि वास्तविकता से कोसों दूर है | दरअस्ल जब हम किसी वस्तु का आकार छोटा करते जाते हैं तो एक आकार के बाद उसके किसी विशेष गुण जैसे कि रंग, चुम्बकीयता, वैद्युत अथवा रासायनिक गुणों में अनियमित बदलाव देखने को मिलता है यदि इसी अनियमितता का प्रयोग करते हुए एक टेकनोलॉजी विकसित की जाती है तो उसे नैनोटेकनोलॉजी कह सकते हैं | लघुरूपण (miniaturization) मात्र ही नैनोटेकनोलॉजी नहीं है |
सही है मान लिया, परन्तु आकार छोटा करने पर अनियमित बदलाव क्यों होता है?
किसी भी वस्तु में पृष्ठ या सतह पर स्थित अणु भीतरी अणुओं से भिन्न होते हैं| पृष्ठ अणु भीतरी अणुओं से अधिक क्रियाशील होते हैं| इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि जैसे किसी देश की सीमा रेखा पर उग्र सिपाही होते हैं जबकि उसके अतिरिक्त देश में साधारणतया शांतिप्रिय नागरिक रहते हैं| जब हम वस्तु का आकार छोटा करते जाते हैं तो भीतरी अणुओं की तुलना में पृष्ठ अणुओं की संख्या बढ़ती जाती है और एक आकार के पश्चात् वस्तु के गुणों का नियंत्रण पृष्ठ अणुओं के पास आ जाता है| यह क्रान्तिक आकार (critical size) विभिन्न गुणों तथा पदार्थों के लिए अलग – अलग होता है| उदाहरण के लिए एक घनाकार वस्तु लेते हैं जिसकी एक भुजा कि लम्बाई ‘क’ है | इसका पृष्ठ क्षेत्रफल ६.क२ होगा तथा आयतन क३| यदि पृष्ठ क्षेत्र व आयतन का अनुपात लें तो ६/क आयेगा, अर्थात् जैसे -जैसे हम ‘क’ को छोटा करते जायेंगे यह अनुपात बढ़ता रहेगा|
अच्छा ये पृष्ठ अणु भीतरी अणुओं से भिन्न क्यों होते हैं?
भीतरी अणुओं के सभी ओर समान अणु रहते हैं जिससे उनमें एक संतुलन बना रहता है जो कि उन्हें स्थायित्व प्रदान करता है| इसके विपरीत सतह पर स्थित अणुओं के एक ओर पदार्थ तो दूसरी ओर शून्य या वायु रहती है; इस कारणवश उनका संतुलन नहीं बन पाता और इसी संतुलन को बनाने के लिए वे ज्यादा क्रियाशील रहते हैं|
इस दिशा में निकट भविष्य में मेरे द्वारा संभावित पोस्ट निम्नलिखित हैं -
- नैनोटेकनोलॉजी को अलग विषय के रूप में अध्ययन करने की क्या आवश्यकता है?
- नैनोटेकनोलॉजी : उम्मीदें और विश्वास
- प्रकृति से सीख : नैनो-बायोटेकनोलॉजी
- नैनोटेकनोलॉजी : कितनी वास्तविकता कितना पाखंड
October 25, 2007 at 6:25 am |
पाठको को नैनोटेक्नोलॉजी हिंदी मे समझाने का तुम्हारा प्रयास सराहनीय हैं। आशा करता हूं की तुम अपने इरादों पे अटल रहोगे। – मनीष