हमारी पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा
विगत सप्ताह नीरज के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ| नीरज एक माह के लिए ह्यूस्टन से भारत आया हुआ है| जब उसने इस यात्रा का प्रस्ताव रखा तो मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया| १९ अक्टूबर शुक्रवार को प्रातः ६ बजे नीरज कानपुर पहुँचा| दिनभर मैंने उसे आई. आई. टी. तथा अपनी प्रयोगशाला का भ्रमण कराया| आश्चर्यजनक रूप से उसे हमारी मेस का भोजन काफी पसंद आया| सायंकाल हम लोग अनूप जी के साथ उनके अरमापुर स्थित आवास पर गए| अनूप जी के साथ कई विषयों पर चर्चा हुई जिनमे से साम्यवाद तथा आई. आई. टी. का इन्फोठेला प्रमुख थे| उन्होंने मुझे राग दरबारी व नीरज को हिन्दी पुस्तक भेंट की| मुझे भी ब्लॉग जगत में पदार्पण करने हेतु काफी कुरेदा गया|
रात्रि साढ़े ग्यारह बजे हमने रेलवे स्टेशन की ओर कूच किया| शिव गंगा एक्सप्रेस करीब एक घंटा विलम्ब से आई परन्तु हमने समय कुछ ऐसा काटा कि पता नहीं चला| खैर प्रातः ९ बजे हम बनारस पहुंचे| थोड़ी जद्दोजहद के बाद एक होटल में कमरा लिया और तरोताजा होने के बाद सारनाथ की ओर प्रस्थान किया| सारनाथ में हम मंदिरों के अतिरिक्त संग्रहालय भी गए| नीरज भारत सरकार के द्वारा किए गए संरक्षण प्रबंधों से काफी प्रभावित हुआ और बोला कि हम लोग बेवजह ही सरकार कि हर बात पर निंदा किया करते हैं|
अपराह्न में हम काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बी. एच. यू.) गए और काशी विश्वनाथ मन्दिर में दर्शन के पश्चात् अपने पूर्व शिक्षक श्री राम शरण सिंह से भी मिले| सर के साथ करीब डेढ़ घंटे तक हमने विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श किया| सर ने हमें रात्रिभोज पर आमंत्रित किया जिसका हमने भारत व आस्ट्रेलिया के बीच ट्वेन्टी-ट्वेन्टी मैच के साथ आनंद लिया| इससे पहले सायंकाल हमने अस्सी घाट से दशाशमेघ घाट तक नौका विहार का आनंद भी लिया|
अगले दिन प्रातः ही हमने इलाहाबाद कि ओर चढा़ई कर दी| प्रातः अल्लापुर स्थित मामा जी के आवास पर नाश्ता करने के पश्चात् हम नीरज के अंकल जी के साथ संगम नहाने गए| नीरज के अंकल जी दरअसल एक रोचक व्यक्तित्व निकले| जीवन के अनेक पहलुओं पर हमने उनके विचार सुने| उन्होंने हमें ब्रह्म विवाह, अष्टावक्र गीता, स्वस्थ जीवन शैली इत्यादी के बारे में बताया| उनकी सभी बातों से मैं सहमत था यह तो नहीं कहूँगा परन्तु हिंदुत्व के बारे में काफी जानने को मिला|
संगम स्नान के बाद हम मुग़ल सम्राट अकबर के किले में स्थित अक्षयवट देखने गए| इस वृक्ष का मुख्य भाग अब किले के सेना अधीन क्षेत्र में है जो कि आम नागरिकों के लिए निषिद्ध है| कहते हैं आदिकाल में जब जलप्रलय आई थी तब इसी अक्षयवट के सहारे ही कुछ लोग बच पाये थे| खैर प्रलय तो क्या गंगा में भीषण बाढ़ आयी होगी| सायंकाल हम लोग शिवकुटी स्थित ज्ञानदत्त पांडे जी के आवास गए| थोड़ी मशक्कत और कुछ फोन कॉल्स के फलस्वरूप हमने ज्ञानदत्त जी का घर ढूंढ़ निकाला| उनसे हमने रेलवे से संबंधित कई शंकाओं का समाधान किया | उन्होंने रेलवे-लालू किस्से पर भी प्रकाश डाला| वे हमारे शोध कार्य के बारे में जानने के लिए भी काफी उत्सुक थे | नीरज ने उन्हें गैस हाईड्रेट्स के बारे में बताया तो उन्होंने काफी दिलचस्पी दिखाई|
रात में हम इलाहाबाद-मथुरा एक्सप्रेस से वापस कानपुर लौट आए| अंततः हमारी तीन दिवसीय थकान भरी पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा समाप्त हुई |





October 24, 2007 at 5:54 pm
अरे वाह्, बधाई भाई। ब्लाग शुरू कर दिये। सही है। नाम् भी धांसू है। लगे रहो।
October 25, 2007 at 2:14 am
बहुत बढिया अंकुर! अभी तो मस्त लग रहे हो। जब निन्दा पुराण में हम पर अध्याय लिखोगे तब शायद पेट में दर्द हो!
October 25, 2007 at 2:19 am
आपको मालूम है क्या कि हम आप तक अनूप शुक्ल जी के माध्यम से पहूँच कर मजा ले रहे हैं आपकी लेखनी का..आप चाहें तो बस, हमारे माध्यम से हम तक पहुँच कर सेम टू सेम कर सकते हैं….हम सेम पिंच का बुरा नहीं मानते.
October 25, 2007 at 3:18 am
आपका यात्रा वृतान्त अच्छा लगा, ब्लाग की बधाई, प्रयाग आये और बिना मिले ही चले गये अच्छी बात नही है। शायद आपको पता न हुआ होगा कि और कोई भी इलाहाबाद में है
शुभकामनाऐं।
October 25, 2007 at 4:51 am
चलिये अब आप भी इस ब्लॉग दलदल में धंस गये आई मीन आ गये. अब आ ही गये हैं तो नियमित लिखते रहिये..वैसे आपको शायद मालूम ना हो तो बता दें कि फुरसतिया जी का यह 455 वां शिकार है .वो ऎसे ही लोगों को ब्लॉगर बनाते रहे हैं… रही सही कसर मित्र समीर पूरी कर देंगें..टिपिया टिपिया के..आगे आगे देखिये होता है क्या
आप तो बस डटे रहिये जी. हम तो हैं ही ना