November 25, 2007
वैज्ञानिक लेखों की निंदा पुराण से असंगति के कारण मैंने अपने सभी वैज्ञानिक लेखों को अपने नए ब्लॉग नैनोविज्ञान पर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया है| अभी तक लिखे गए सभी वैज्ञानिक लेख फिलहाल दोनों ब्लॉग्स पर उपलब्ध हैं| भविष्य में होने वाली सभी वैज्ञानिक प्रविष्टियाँ नैनोविज्ञान पर ही होंगी | यदि कोई असुविधा हुई हो तो उसके के लिए खेद है|
धन्यवाद,
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Posted by अंकुर वर्मा
November 24, 2007
जैसाकि हमने पिछली पोस्ट में जाना कि प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी में दृश्य प्रकाश के प्रयोग के कारण उसकी विभेदन क्षमता की एक सीमा होती है जोकि लगभग २०० नैनोमीटर होती है| इससे निजात पाने के लिए लोगों ने सोचा कि क्यों न दृश्य प्रकाश के अतिरिक्त कोई ऐसी तरंग प्रयोग में लाई जाय जिसकी तरंग दैर्ध्य कम हो| कई विकल्प सामने आए जैसे कि पराबैंगनी (ultra-violet), एक्स-रे, गामा-रे इत्यादी, परन्तु इतना ही काफी नहीं था, जरूरत थी एक ऐसी तरंग की जोकि पहले तो पदार्थ से अंतःक्रिया (interaction) करके उसके प्रतिबिम्ब का निर्माण करे फ़िर उस प्रतिबिम्ब को देखा भी जा सके| ज्ञातव्य हो कि दृश्य प्रकाश के अलावा कोई भी विकिरण मानवीय नेत्रों से सीधे नहीं देखा जा सकता है| १९३१ में जर्मन वैज्ञानिक अर्न्स्ट रस्का और मैक्स नॉल ने डी-ब्रॉगली सिद्धांत के आधार पर पहले इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया| डी-ब्रॉगली सिद्धांत (वस्तुत: परिकल्पना) के अनुसार सभी पदार्थों में तरंगों जैसी प्रवृत्ति होती है और उनकी तरंग दैर्ध्य उनके आवेग के व्युत्क्रमानुपाती तथा आवृति उसकी गतिज ऊर्जा के समानुपाती होती है| सीधे शब्दों में इलेक्ट्रॉन तरंग की भाँति व्यवहार करता है और इसकी तरंग दैर्ध्य को इसकी गतिज ऊर्जा से नियंत्रित कर सकते हैं| उदाहरण के लिए २०० किलो वोल्ट की इलेक्ट्रॉन तरंग की तरंग दैर्ध्य मात्र २.५ पिको मीटर (०.००२५ नैनोमीटर) होती है| जहाँ तक यह प्रश्न है कि इलेक्ट्रॉन तरंगों से निर्मित प्रतिबिंब को देखते कैसे हैं, इसका भी एक आसान तरीका है| इलेक्ट्रॉन तरंगें फोटोग्राफिक प्लेट को प्रदीपित करती हैं| अपने इस आविष्कार के लिए रस्का को १९८६ में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया | अब सोच लीजिये कितना समय लगता है नोबेल पुरस्कार के लिए; वैसे उसी वर्ष उनके साथ यह पुरस्कार दो युवा वैज्ञानिकों को भी दिया गया था जिन्होंने १९८१ में पहला क्रमवीक्षण अन्वेषक सूक्ष्मदर्शी (Scanning probe microscope) बनाया था|
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं …
१) प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Transmission Electron Microscope / TEM)
२) क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Scanning Electron Microscope / SEM)
इनमें से पहला सूक्ष्मदर्शी लगभग उसी सिद्धांत पर कार्य करता है जिस पर कि प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी करता है केवल इसमें कांच के लेंस के स्थान पर विद्युत्स्थैतिक व विद्युतचुम्बकीय लेंस होते हैं| इसमें देखने वाली वस्तु को अत्यधिक पतला (~५० नैनोमीटर) बनाया जाता है क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉन तरंगें वस्तु के पार जाकर दूसरी ओर प्रतिबिम्ब निर्मित करती हैं| इसीलिए इसमें देखने के लिए नमूने की तैयारी करना काफी कठिन होता है और सभी वस्तुएं इसमें देखी भी नहीं जा सकतीं | क्योंकि अवलोकन के वस्तु को अत्यधिक ऊंचे निर्वात में रखा जाता है और उसके ऊपर अत्यधिक ऊर्जा की इलेक्ट्रॉन तरंगें गिरतीं हैं इसलिए यह जांच का एक विध्वंसक (destructive) तरीक़ा है| आधुनिक प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता करीब ०.२ नैनोमीटर से भी कम होती है|

प्रेषण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Transmission Electron Microscope / TEM)
दूसरे प्रकार के सूक्ष्मदर्शी की कार्यप्रणाली थोड़ी अलग होती है इसमें इलेक्ट्रॉन तरंगों को केंद्रित करके एक सूक्ष्म पुंज पदार्थ पर डाला जाता है| जब ये अधिक ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पदार्थ पर पड़ते हैं तो उससे अपेक्षाकृत कम ऊर्जा के द्वितीयक (secondary) इलेक्ट्रॉन, पृष्ठ प्रकीर्ण (back-scattered) इलेक्ट्रॉन तथा अभिलक्षणिक (characteristic) एक्स-रे इत्यादि निकलते हैं| इन इलेक्ट्रॉन किरणों की मदद से वस्तु के आकार के बारे में सूचना मिलती है और प्रतिबिम्ब का निर्माण किया जाता है| क्योंकि एकबार में वस्तु के केवल एक ही बिन्दु की सूचना मिलती है अतः किरण पुंज को क्रमशः अलग अलग स्थान पर ले जाकर पूरी वस्तु (या उसके एक भाग) का प्रतिबिम्ब निर्मित करते हैं| इसी कारण से इसे क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कहा जाता है| यद्यपि इसकी विभेदन क्षमता पहले वाले से करीब १० गुना कम होती परन्तु इसमें देखने के लिए नमूना तैयार करना काफ़ी आसान होता है| यही कारण है कि आज ये इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कहीं अधिक लोकप्रिय है| इसमें अपेक्षाकृत कम ऊर्जा की इलेक्ट्रॉन तरंगें प्रयुक्त होती हैं फिरभी यह एक विध्वंसक तरीक़ा ही है| आधुनिक क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता करीब १ से २ नैनोमीटर तक होती है|

क्रमवीक्षण इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Scanning Electron Microscope / SEM)
इन दोनों ही सूक्ष्मदार्शियों में पदार्थ से निकलने वाली अभिलक्षणिक एक्स-रे के माध्यम से पदार्थ का गुणात्मक (qualitative) तथा परिमाणात्मक (quantitative) तात्त्विक विश्लेषण (elemental analysis) भी सम्भव है| इस विधि को एक्स-रे का ऊर्जा प्रकीर्णन विश्लेषण (Energy Dispersive Analysis of X-rays / EDAX) कहते हैं|
छायाचित्र सूचक:
१. इलेक्ट्रॉन बंदूक (electron gun)
२. विद्युत-चुम्बकीय लेंस (electromagnetic lens)
३. निर्वात पम्प प्रणाली (vacuum pump system)
४. नमूना मंच (sample stage)
५. नियंत्रण पट्टिका (control panel)
६. प्रदर्शन पट्टिका (display panel)
७. शीतलक (coolant)
८. कुछ और भूमिगत इलेक्ट्रानिकी (some more underground electronics)
९. प्रचालक गण (operators)
छायाचित्र स्रोत: http://www.vcbio.science.ru.nl/
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Posted by अंकुर वर्मा
November 22, 2007
सूक्ष्मदर्शियों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आइये जानते हैं सबसे सरल और प्रचलित सूक्ष्मदर्शी को, जिसे प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी (optical microscope) कहते हैं| जीहाँ मैं उसी सूक्ष्मदर्शी की बात कर रहा हूँ जोकि कक्षा ९ या १० में विज्ञान के गुरु जी ने पढ़ाया था| क्योंकि उन्नत सूक्ष्मदार्शियों के अध्ययन से पहले इस सूक्ष्मदर्शी के सिद्धांत की समझ आवश्यक है अतः संक्षेप में इसके बारे में जानकारी करते हैं| जैसा कि आप सभी जानते होंगे इस सूक्ष्मदर्शी का निर्माण दो उत्तल (convex) लेंसों से होता है (इसी वजह से इसे संयुक्त सूक्ष्मदर्शी (compound microscope) भी कहते हैं), जिन्हें वस्तुनिष्ठ (objective) लेंस और नेत्रिका (eye piece) कहते हैं| सूक्ष्मदर्शी में प्रतिबिम्ब निर्माण कैसे होता है यह नीचे दिए गए किरण आरेख से समझा जा सकता है| सर्वप्रथम वस्तुनिष्ठ लेंस से एक वास्तविक प्रतिबिम्ब नेत्रिका के फोकस केन्द्र के अन्दर बनता है जिसे नेत्रिका आवर्धित करके एक आभासी प्रतिबिम्ब के रूप में बना देती है|

सूक्ष्मदर्शी का कुल आवर्धन दोनों लेंसों के आवर्धन के गुणनफल के बराबर होता है| वस्तुनिष्ठ लेंस प्रायः ५, १०, २०, ५० तथा १०० गुणा आवर्धन के होते हैं जबकि नेत्रिका ५ व १० गुणा आवर्धन के साथ आती है| अर्थात् संयुक्त प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी से अधिकतम १००० गुणा आवर्धन प्राप्त हो सकता है| मानवीय नेत्रों की विभेदन क्षमता (resolving power / resolution) करीब ०.२ मिलीमीटर होती है अर्थात् हम न्यूनतम ०.२ मिलीमीटर की दूरी पर स्थित वस्तुओं में भेद कर सकते हैं| अतः संयुक्त प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी से १००० गुणा आवर्धन के पश्चात् ०.२ माइक्रॉन (या २०० नैनोमीटर) की विभेदन क्षमता सम्भव है| इस सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने १६६५ में किया था| उस समय की अपेक्षा में आधुनिक सूक्ष्मदर्शी की संरचना काफ़ी जटिल होती है; इसमें दो आधारभूत लेंसों के अतिरिक्त अन्य कई लेंस प्रयोग में लाये जाते हैं जोकि प्रतिबिम्ब की गुणवत्ता में सुधार लाते हैं|
अब प्रश्न यह उठता है कि इस सूक्ष्मदर्शी से २०० नैनोमीटर से छोटी वस्तुएं क्यों नहीं देखी जा सकतीं? कारण यदि साधारण भाषा में कहा जाय तो यह है कि इस सूक्ष्मदर्शी में प्रतिबिम्ब निर्माण दृश्य प्रकाश किरणों से होता है जिनकी तरंग दैर्ध्य ४०० से ७०० नैनोमीटर होती है| रैले मानदण्ड (Rayleigh Criterion) के अनुसार किसी भी सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता उसमे प्रयुक्त प्रकाश की तरंग दैर्ध्य के आधे से अधिक नहीं हो सकती| अतः २०० नैनोमीटर संयुक्त सूक्ष्मदर्शी की मूलभूत सीमा है| यद्यपि पिछले पाँच दशकों में कई नए प्रकार के प्रकाशिक सूक्ष्मदार्शियों का विकास किया गया है जिनके द्वारा अब ५० नैनोमीटर से भी कम देख पाना सम्भव है तथा प्रतिबिम्ब गुणवत्ता मैं भी काफ़ी सुधार हुआ है| इनमें से संनाभि सूक्ष्मदर्शी (Confocal Microscope) तथा स्कैनिंग नियर फील्ड प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी (Scanning Near Field Optical Microscope, SNOM/NSOM) उल्लेखनीय हैं| ये दोनों ही सूक्ष्मदर्शी आजकल जैव तथा नैनो वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग किए जाते हैं| इनकी कार्यप्रणाली भविष्य में कभी बताऊंगा|
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Posted by अंकुर वर्मा
November 20, 2007
आजकल हम अपने शोधकार्य हेतु बंगलुरू स्थित जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (या संक्षेप में जे.एन.सी.) में आए हुए हैं| अगले करीब ६ सप्ताह यहीं की जलवायु में बीतेंगे| रविवार सुबह साढ़े ६ बजे हम बंगलुरू पहुंचे| हमारे आवास की व्यवस्था यहाँ पर आई. आई. एस. सी. स्थित जवाहर विसिटर्स हॉउस मैं की गयी है जहाँ हमें पहुँचने में तनिक देर न लगी| यहाँ पर एक बात का उल्लेख अत्यन्त आवश्यक है कि बंगलुरू पहुँचने से पूर्व हमारे मित्रों ने, जोकि यहाँ से किसी न किसी प्रकार से सम्बन्ध रखते हैं, बताया था कि यहाँ ऑटो रिक्शा से यात्रा करना अपेक्षाकृत सस्ता और विश्वसनीय है; जोकि एकदम खोखला दावा साबित हुआ, बंगलुरू सिटी रेलवे स्टेशन से आई. आई. एस. सी. तक की करीब ५ किलोमीटर की सवारी के हमें ८० रुपये देने पड़े| बाद में जब हमने और तफ्तीश की तो पता चला कि प्रीपेड ऑटो के सिर्फ़ ४३ रुपये लगते हैं और हमसे पहले भी अनेक व्यक्ति इस ठगी का शिकार हुए हैं| इससे अच्छा तो अपना कानपुर ही है कम से कम कोई इमानदारी का दावा तो नहीं करते|
रविवार का दिन हमने अपने पुराने मित्रों से मेल मिलाप में गुजारा| सुबह हम अपने आई आई टी कानपुर के मित्र विवेक और मणि से मिले और दोपहर का भोजन हमने उन्हीं के निवास पर भारत - पाकिस्तान एकदिवसीय क्रिकेट मैच देखते हुए किया| शाम को हमारे कॉलेज के मित्र दीपक पन्त और चन्द्रशेखर (चंदू) हमसे मिलने आए| दोनों ही आजकल यहाँ पर सॉफ्टवेयर टाइप कि जॉब करते हैं| पूरा दिन कैसे गुज़रा पता ही नहीं चला|
सोमवार प्रातः ९ बजे हम जे.एन.सी. पहुँच गए| आई.आई.एस.सी. से जे.एन.सी. करीब १५ किलोमीटर दूर है और समय समय पर इन दोनों संस्थानों के बीच बस की व्यवस्था है| सौभाग्यवश इस समय जे. एन. सी. का वार्षिक इन हाउस कार्यक्रम चल रहा है, जोकि नेहरू जी के जन्मदिन के आस पास आयोजित किया जाता है| इसमें यहाँ पर स्थित सभी विभागों के लोग एकत्रित होकर आपस में आपने शोध कार्य की चर्चा करते हैं| सायंकाल चौदहिया मेमोरियल हाल में पद्म श्री उस्ताद राशिद खान के हिन्दुस्तानी सुर वाचन का आयोजन था| चौदहिया मेमोरियल हाल आई. आई. एस. सी. परिसर के निकट ही स्थित है और एक वायलिन के आकार का बना हुआ है| कहते हैं कि यह एक रमणीय स्थान है पर हमें तो कुछ ख़ास लगा नहीं|

चौदहिया मेमोरियल हॉल, मल्लेश्वरम, बंगलुरू (सौजन्य से : गूगल अर्थ)
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अरुचि के कारण जनाब राशिद खान हमें एक घंटे से अधिक नहीं रोक पाये| वैसे इस बीच हमने कई ऐसे लोग देखे जोकि उनके गायन का भरपूर आनंद उठा रहे थे| तत्पश्चात रात्रिभोज का आयोजन था जोकि हमारे जैसे लोगों के लिए सुर संध्या के समापन की प्रतीक्षा किए बगैर ही समय से पूर्व प्रारम्भ हो गया था| अभी बंगलुरू और जे.एन.सी. में तो काफी दिनों रहना है इसलिए इनके बारे में बाद में विस्तार से लिखूंगा|
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यात्रा-विवरण |
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Posted by अंकुर वर्मा