आखिरकार ताजमहल भी देख ही लिया
November 9, 2007पिछले कुछ दिनों से वो क्या कहते हैं हमारे पैरों में सनीचर सवार हो गया है| यही कारण था की गत २६ वर्षों में २० से अधिक बार आगरा जाने के बाद भी जो काम हमने नहीं किया पैरों में सवार सनीचर ने इस बार करा दिया| जीहाँ अब हम भी ताज देखने वालों के समूह में आ गए हैं| दरअसल इन दिनों श्री रोद्रिगो मार्तिनेज़, जोकि कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय इरविन में शोधार्थी हैं, ३ माह के लिए सहयोगी शोधकार्य हेतु आई आई टी कानपुर स्थित हमारी प्रयोगशाला में आए हुए हैं| हमारे सभी मित्र पहले से ही ताज देख चुके थे इसलिए केवल हम ही बचे उनके साथ जाने के लिए| कानपुर से आगरा करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर है अतः हमने केवल एक दिन का प्लान बनाया| प्रातः साढ़े ८ बजे इलाहबाद-मथुरा एक्सप्रेस से हम आगरा कैंट स्टेशन पर उतरे और वहाँ से सीधा ईदगाह बस-स्टैंड पहुँच गए फ़तेहपुर-सीकरी जाने के लिए| करीब सवा ९ बजे बस चली जिसने हमें ११ बजे फ़तेहपुर-सीकरी उतार दिया| वहाँ पहले हमलोग बुलंद दरवाजा और सलीम चिश्ती दरगाह देखने गए| पता चला कि यह क्षेत्र अभी भी सरकार ने अपने संरक्षण में नहीं लिया है और चिश्ती परिवार ही अभी भी इसकी देखरेख करता है अतः आप यहाँ के रखरखाव से संतुष्ट नहीं हो सकते| इसके अतिरिक्त उसी परिसर में एक मस्जिद चिश्ती परिवार की अन्य कब्रें तथा अनारकली का सुरक्षित भूमिगत पलायन मार्ग भी देखा; बताया गया कि यह आगरा के लालकिले से दिल्ली होता हुआ लाहौर तक जाता है जहाँ पर आज भी अनारकली की मज़ार उपस्थित है| खैर गाइड महोदय को भी शायद ज़्यादा उम्मीद नहीं थी कि हम उनकी इस बात से सहमत होंगे| कहानी कुछ इस प्रकार है कि सलीम चिश्ती अजमेर के ख्वाज़ा मुईनुद्दीन् चिश्ती के पौत्र थे| जब बादशाह अकबर द्वारा संतान प्राप्ति की दिशा में किए गए सभी प्रयास निष्फल रहे तो वह स्वप्न में आए निर्देश के मुताबिक़ बाबा सलीम चिश्ती के पास आए| उन्हीं के आशीर्वाद से अकबर को महारानी जोधाबाई से पुत्र प्राप्ति हुई और बाबा के नाम पर उसका नाम भी सलीम रखा गया| बाबा सलीम चिश्ती के सम्मान में ही बादशाह ने ये बुलंद दरवाजा बनवाया| उसके बाद अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी को अपनी राजधानी भी बनाया परन्तु केवल १५ वर्षों में ही उसे अपना यह निर्णय बदलना पड़ा| इसके अलावा यहाँ पर बादशाह अकबर का महल भी है जोकि भारत सरकार के पुरातत्व संरक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है| यहाँ पर हमने जोधाबाई महल, पंचमहल, अस्तबल, पचीसी दरबार, दीवान-ऐ-खास, दीवान-ऐ-आम, बीरबल महल, अनूप तालाब (जहाँ पर सुरसम्राट तानसेन अपना संगीत वाचन करते थे) इत्यादि भी देखा| यह सब जानकर एक बार को तो यकीन हो गया कि जो भी मुग़ल-ऐ-आज़म में दिखाया गया था वो कुछ तो वास्तविकता से प्रेरित था|
फ़तेहपुर सीकरी से लौटने के बाद हम लोगों ने सीधे ताजमहल जाने का निर्णय लिया| वहाँ जाकर पता चला कि प्रवेश शुल्क भारतीयों के लिए केवल २० रुपये है जबकि विदेशी नागरिकों के लिए यह ७५० रुपये है| विदेशियों के साथ इसके बदले कोई खास विशिष्ट व्यव्हार नहीं किया जाता| अपने मित्र के इस बात से संबंधित प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था हमारे पास| इसके अतिरिक्त आगरा के लालकिले व फ़तेहपुर-सीकरी किले में भी इसी प्रकार भेदकर शुल्क का प्राविधान है| भारतीय रु.२० और विदेशी रु.२५०| हाँ यदि आप ताज का टिकट पहले ले लें तो कोई दूसरे टिकट लेने की आवश्यकता नहीं है| जहाँ तक ज्ञान जी के इस प्रश्न का सवाल है कि पाकिस्तानी व बंगलादेशी को कैसे पहचानते है कि वे विदेशी हैं, दरअसल वहाँ ऐसा कोई प्राविधान नहीं है जिससे कि यह पता चल सके कि कोई देशी है या विदेशी| यह आपकी इमानदारी पर आश्रित है कि आप वहाँ लगे निर्देशों का पालन करें| यह बात अवश्य है कि यदि आप गोरी चमड़ी वाले हैं या फ़िर नीग्रो हैं तो आप को वहाँ गेट पर रोक दिया जाएगा| ताज के प्रवेश द्वार पर सुरक्षा जाँच के लिए दो (स्त्री व पुरूष) लम्बी कतार लगी थी| वहाँ पर उपस्थित कुछ दलालों ने हमें बिना पंक्तिबद्ध हुए प्रवेश कराने का प्रस्ताव दिया| इसके बदले उनकी मांग २५० से शुरू होकर ५० रुपये तक आ गयी पर हमने साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार से सख्त परहेज है और उनके द्वारा बताई गयी यह बात भी सफ़ेद झूठ साबित हुयी कि पंक्ति में हमें एक घंटे से ज्यादा लगेगा क्योंकि १५ मिनट से भी कम समय में हम अन्दर थे| अतः यदि आप या आपका कोई संबन्धी ताज जाय तो कृपया इस प्रकार के माफिया से सावधान रहे और उनकी किसी भी बात पर यकीन न करे|
अगले करीब ढाई घंटे हम लोगों ने ताज परिसर में बिताये| ताजमहल की सबसे ख़ास बात मेरे हिसाब से इसकी सिमेट्री है क्योंकि भारत में इससे कहीं अधिक कलाकारी के और नमूने उपलब्ध हैं| परन्तु शायद कोई भी इतना बड़ा और सुडौल नहीं होगा| एक और बात हमने ध्यान दी कि आप ताज को जितना दूर से देखें यह उतना ही सुंदर लगता है क्योंकि दूर से ही आप उसकी सुडौलता को समझ सकते हैं| ताज मैं शाम के समय बहुत भीड़ होती है अतः संभवतः सुबह का समय उपयुक्त होता है यहाँ भ्रमण के लिए| ताज के पीछे बहती यमुना यदि साफ़ होती तो दृश्य काफ़ी मनोरम होता| समयाभाव के कारण हम आगरा के किले नहीं जा पाए जो कि संभवतः फतेहपुर-सीकरी जैसा ही है बजाय इसके कि यहाँ से ताजमहल दिखता है| इसके अलावा आगरा का प्रसिद्ध पंछी पेठा खाने का भी अवसर नहीं मिला|
यात्रा के अन्य छायाचित्र निम्नांकित लिंक पर उपलब्ध हैं…
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| आगरा यात्रा |

Posted by अंकुर वर्मा