लिनक्स के रास्ते के रोड़े

November 11, 2007

आज से करीब सात साल पहले जब हमने पहली बार लिनक्स (या लाइनेक्स जो भी बोलें) ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम तथा इसके फायदों के बारे में अपने मित्रों से सुना तो सोचा कि क्यों न एक बार परखा जाय| हमने अपने कंप्यूटर पर लाल टोपी (red hat) ७ संस्थापित किया| धीरे -धीरे काफ़ी कुछ सीखा परन्तु न तो यह इतना प्रयोक्ता मैत्रिपूर्ण लगा और न ही इतनी रूचि उत्पन्न नहीं हो पाई कि माइक्रोसॉफ्ट विन्डोज़ का साथ पूर्णतया छोड़ दें| समय के साथ लिनक्स ने काफ़ी तरक्की की है आज उबुन्टू, फेडोरा, सुसे इत्यादि लिनक्स वितरण हर क्षेत्र में माइक्रोसॉफ्ट विन्डोज़ एक्स.पी. और विस्टा को टक्कर देने में सक्षम हैं| फ़िर लिनक्स की सफलता के रास्ते में कौन खड़ा है ? क्यों आज भी लोग एक मुफ़्त में मिलने वाली वस्तु से अधिक वरीयता एक महंगी वस्तु को दे रहे हैं? भारत में शायद विन्डोज़ की सफलता के पीछे एक बड़ा हाथ यहाँ के लचर नक़ल निरोधक कानून (anti piracy laws) का है क्योंकि अन्यथा लोग विन्डोज़ खरीदने के लिए शायद ४ से २० हज़ार रुपये देना पसंद नहीं करते| परन्तु ऐसा भी नहीं है कि जहाँ इन कानूनों का पालन होता है वहाँ लिनक्स लोकप्रिय हो गया है| मेरे विचार से लिनक्स की असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण लिनक्स ख़ुद है| कैसे? लिनक्स को विकसित करने वाले लोगों ने हमेशा से ही इसे एक कम्प्यूटर में अतिरिक्त दिलचस्पी लेने वालों के लिए बनाना चाहा है जोकि ५ प्रतिशत से भी कम हैं | कभी भी उनका लक्ष्य एक आम प्रयोक्ता और उसकी जरूरतें नहीं रहीं| उदाहरण के लिए आपको आज १०० से भी अधिक सक्रिय लिनक्स वितरण मिल जायेंगे; हर वितरण अपने आप को दूसरे से श्रेष्ठतर बताएगा| आपको हर काम के लिए दसियों सॉफ्टवेयर मिल जायेंगे| किसी का भी प्रयास इन सभी की खूबियों को एकीकृत करके एक अकेला सर्वसक्षम सॉफ्टवेयर बनाने की दिशा में नहीं है| हर लिनक्स वितरण तथा प्रमुख सॉफ्टवेयर्स को बढ़ावा देने के लिए एक प्रयोक्ता समूह होता है जोकि दूसरे सॉफ्टवेयर्स की खूबियों को नज़रंदाज़ करते हुए अपनी ही विशिष्टता को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करेगा|

एक आम आदमी जिसे कि सीमित कंप्यूटर ज्ञान है यदि आज एक लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम चलाने की इच्छा रखता है तो उसके सामने आने वाली दुविधाओं को देखते हैं| सर्वप्रथम कौन सा लिनक्स वितरण? उबुन्टू बहुत प्रयोक्ता मैत्रिपूर्ण और सरल है… नया वाला फेडोरा देखा क्या मस्त लुक है… सुसे की तो बात ही कुछ और है… जितने मुहँ उतनी बात| चलिए मान लिया कि आपने थोड़ी रिसर्च के बाद एक वितरण चुन लिया| अब कौन सा डेस्कटॉप परिवेश? ग्नोम २ ने तो सभी को पीछे छोड़ दिया है… के.डी.ई ४ को आने दो फ़िर देखते हैं कि कौन अच्छा है… अरे ग्नोम और के.डी.ई दोनों ही काफ़ी भारी हैं फ्लक्सबॉक्स देखो इतना हल्का और सारे फीचर्स भी हैं| यदि किसी प्रकार से आपने इस समस्या से भी पार पा लिया तो आगे आपको हर काम के लिए इसी प्रकार से अनेकों विकल्प मिलेंगे| यह मान भी लें कि इस परस्पर प्रतियोगिता के भी अपने लाभ हैं तो भी एक आम प्रयोक्ता के लिए यह कोई मायने नहीं रखता | उसे चाहिए एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम जो कि न्यूनतम प्रयास में प्रयोग हेतु तैयार हो जाय जोकि आज विन्डोज़ बखूबी कर रहा है| भले ही लिनक्स प्रसंशक इसकी लोकप्रियता के कितने ही दावे करें परन्तु वर्तमान परिदृश्य में इसका डेस्कटॉप बाज़ार अंश ५ प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता क्योंकि इस समय ५ प्रतिशत लोगों की ही आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिनक्स का विकास हो रहा है |
__________

मैं स्वयं एक लिनक्स प्रशंसक हूँ और करीब डेढ़ साल से उबुन्टू प्रयोग कर रहा हूँ|


“जस्ट-फॉर-वूमेन” संकल्पना

November 11, 2007

यदि आप दिल्ली, मुम्बई या कोलकाता में रहते हैं तो शायद सुना होगा “जस्ट-फॉर-वूमेन रेडियो चैनल (Meow) १०४.८ ऍफ़ एम”|

म्याऊँ

हमने अपनी पिछली दिल्ली यात्रा के दौरान जून २००७ में इसका विज्ञापन देखा था पर उस समय कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया| फ़िर अभी जब पिछले महीने कोलकाता गए तो यह पुनः आंखों के सामने आया| इस बार क्योंकि एक सप्ताह का समय था अतः इस “जस्ट फॉर वूमन” की संकल्पना के बारे में थोड़ा सोचा| यदि आप इस चैनल को सुने (जोकि कौतूहलवश मैंने किया) तो शायद ही आपको अन्य चैनलों से कोई भिन्नता नज़र आए, परिचारक के चुनाव में भी कोई लिंगभेद नहीं किया जाता| तो फ़िर “जस्ट फॉर वूमन” ऐसा क्या है? वस्तुत: कुछ भी नहीं; शायद दिन में घरेलू महिलाओं के लिए कार्यक्रम कुछ अधिक समय के लिए आता होगा| वास्तव में यह “जस्ट फॉर वूमन” एक कोशिश है इस प्रतियोगी युग में बिना कुछ अतिरिक्त किए अपनी पहचान बनाने की| स्त्रियाँ इस लिए सुनेंगी क्योंकि उनका चैनल है और पुरूष अपनी जिज्ञासावश कि स्त्रियों के चैनल पर ऐसा क्या आता है? वैसे तो “जस्ट फॉर वूमन” एक पुरानी कार्यनीति है| सरिता, गृहशोभा, वनिता इत्यादि पत्रिकाएं पुरुषों में भी उतनी ही लोकप्रिय हैं फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि इन पत्रिकाओं में मेरे हिसाब से स्त्रियों के लिए काफ़ी कुछ विशेष होता है, परन्तु रेडियो चैनल पर मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला| शायद स्त्री-पुरूष समानता के इस युग में कोई दोनों की रुचियों में भी कोई अन्तर नहीं बचा है|