अक्सर आपने किसी बैठक, सभा या सेमिनार के बीच में किसी न किसी मान्यवर का मोबाइल फोन बजते हुए सुना होगा यद्यपि आयोजक पहले ही घोषित कर देते हैं कि कृपया अपना मोबाइल फोन स्विच ऑफ़ कर दें| यदि किसी आयोजक का ही फ़ोन बजने लगे तो भी कोई अचरज की बात नहीं| इसके दो कारण हो सकते हैं; पहला कि ये मान्यवर स्विच ऑफ़ करने वाले निवेदन को जाने या अनजाने नज़रंदाज़ कर देते हैं या फ़िर दूसरा कि ये बताना चाहते हैं कि “हमरे लगे भी है”| एक ज़माना था (अभी भी शायद चल रहा है) कि लोग अपना मोबाइल दिखाने के बहाने ढूँढ़ते थे जैसे कि सक्रिय हाथ में हमेशा मोबाइल पकड़े रहना, निश्चय ही यह सुविधाजनक तो नहीं रहता होगा| एक और बात है कि नयी नयी रिंग टोन डाउनलोड की है तो जनता को सुनाने का तो फ़र्ज़ बनता है| यदि मोबाइल फोन शिष्टाचार को ध्यान में रखें तो यह उतनी ही अभद्रता है जितना कि किसी सभा में शोर मचाना| दरअसल इसमें पूर्णतया कोई एक व्यक्ति दोषी नहीं है क्योंकि जब बचपन में शिष्टाचार की सीख दी गयी थी तब मोबाइल तो होता नहीं था सो माँ-बाप या गुरू जी ने कुछ बताया नहीं| अब अगर कोई बताता है तो भेजे में उतरता नहीं है| एक बड़े तबके की समस्या यह भी होती है कि उन्हें मोबाइल में नंबर डायल करने या रिसीव करने के सिवा कुछ करना आता ही नहीं है| हर किसी से उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह रातों रात मोबाइल प्रयोग में पारंगत हो जाय परन्तु समस्या यहाँ नहीं कहीं और है| वास्तव में आज जनसाधारण में इस सम्बन्ध में एक समझ का आभाव है| आज जिसे देखो “एक्सपेक्टिंग एन इम्पोर्टेन्ट काल”; पता नहीं चार साल पहले तक दुनिया चलती कैसे थी बिना इस “इम्पोर्टेन्ट काल” के| ईश्वर मोबाइल प्रयोक्ताओं को सदबुद्धि प्रदान करे|
Posted by अंकुर वर्मा