आजकल हम अपने शोधकार्य हेतु बंगलुरू स्थित जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (या संक्षेप में जे.एन.सी.) में आए हुए हैं| अगले करीब ६ सप्ताह यहीं की जलवायु में बीतेंगे| रविवार सुबह साढ़े ६ बजे हम बंगलुरू पहुंचे| हमारे आवास की व्यवस्था यहाँ पर आई. आई. एस. सी. स्थित जवाहर विसिटर्स हॉउस मैं की गयी है जहाँ हमें पहुँचने में तनिक देर न लगी| यहाँ पर एक बात का उल्लेख अत्यन्त आवश्यक है कि बंगलुरू पहुँचने से पूर्व हमारे मित्रों ने, जोकि यहाँ से किसी न किसी प्रकार से सम्बन्ध रखते हैं, बताया था कि यहाँ ऑटो रिक्शा से यात्रा करना अपेक्षाकृत सस्ता और विश्वसनीय है; जोकि एकदम खोखला दावा साबित हुआ, बंगलुरू सिटी रेलवे स्टेशन से आई. आई. एस. सी. तक की करीब ५ किलोमीटर की सवारी के हमें ८० रुपये देने पड़े| बाद में जब हमने और तफ्तीश की तो पता चला कि प्रीपेड ऑटो के सिर्फ़ ४३ रुपये लगते हैं और हमसे पहले भी अनेक व्यक्ति इस ठगी का शिकार हुए हैं| इससे अच्छा तो अपना कानपुर ही है कम से कम कोई इमानदारी का दावा तो नहीं करते|
रविवार का दिन हमने अपने पुराने मित्रों से मेल मिलाप में गुजारा| सुबह हम अपने आई आई टी कानपुर के मित्र विवेक और मणि से मिले और दोपहर का भोजन हमने उन्हीं के निवास पर भारत – पाकिस्तान एकदिवसीय क्रिकेट मैच देखते हुए किया| शाम को हमारे कॉलेज के मित्र दीपक पन्त और चन्द्रशेखर (चंदू) हमसे मिलने आए| दोनों ही आजकल यहाँ पर सॉफ्टवेयर टाइप कि जॉब करते हैं| पूरा दिन कैसे गुज़रा पता ही नहीं चला|
सोमवार प्रातः ९ बजे हम जे.एन.सी. पहुँच गए| आई.आई.एस.सी. से जे.एन.सी. करीब १५ किलोमीटर दूर है और समय समय पर इन दोनों संस्थानों के बीच बस की व्यवस्था है| सौभाग्यवश इस समय जे. एन. सी. का वार्षिक इन हाउस कार्यक्रम चल रहा है, जोकि नेहरू जी के जन्मदिन के आस पास आयोजित किया जाता है| इसमें यहाँ पर स्थित सभी विभागों के लोग एकत्रित होकर आपस में आपने शोध कार्य की चर्चा करते हैं| सायंकाल चौदहिया मेमोरियल हाल में पद्म श्री उस्ताद राशिद खान के हिन्दुस्तानी सुर वाचन का आयोजन था| चौदहिया मेमोरियल हाल आई. आई. एस. सी. परिसर के निकट ही स्थित है और एक वायलिन के आकार का बना हुआ है| कहते हैं कि यह एक रमणीय स्थान है पर हमें तो कुछ ख़ास लगा नहीं|
चौदहिया मेमोरियल हॉल, मल्लेश्वरम, बंगलुरू (सौजन्य से : गूगल अर्थ)
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अरुचि के कारण जनाब राशिद खान हमें एक घंटे से अधिक नहीं रोक पाये| वैसे इस बीच हमने कई ऐसे लोग देखे जोकि उनके गायन का भरपूर आनंद उठा रहे थे| तत्पश्चात रात्रिभोज का आयोजन था जोकि हमारे जैसे लोगों के लिए सुर संध्या के समापन की प्रतीक्षा किए बगैर ही समय से पूर्व प्रारम्भ हो गया था| अभी बंगलुरू और जे.एन.सी. में तो काफी दिनों रहना है इसलिए इनके बारे में बाद में विस्तार से लिखूंगा|

November 20, 2007 at 7:05 pm |
अंकुर! जेएनसीएएसआर में प्रो . के. एस. वल्दिया से ज़रूर मिलना . जहां तक सम्भव है वहीं होंगे . वयोवृद्ध भूवैज्ञानिक और पर्यावरणविद हैं और कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं. हिमालय और वैदिक नदी सरस्वती पर अपने बेहतरीन काम के लिए जाने जाते हैं . जबर्दस्त हिंदीप्रेमी और ओजस्वी वक्ता हैं . हमारी पत्रिका के लिए सरस्वती पर एक बहुत शानदार लेख देकर सहयोग किया था .
November 20, 2007 at 7:35 pm |
दीपक पंत और मणि के नाम से एचबीटीआई के १९९२-१९९५ के दौर की याद आ रही है।
November 20, 2007 at 10:32 pm |
कानपुर में इतना लफ़ड़ा नहीं है भाई। अच्छा लिखा।
November 21, 2007 at 10:12 am |
अतुल जी! हो सकता है कि दीपक पन्त और मणि आपको एच. बी. टी. आई. की याद दिलाएं पर जिनका मैंने ज़िक्र किया है उनका इससे कोई वास्ता नहीं है| और हाँ ये इतनी पुरानी पीढ़ी के भी नहीं हैं; सभी अभी ३० से कम हैं|
November 24, 2007 at 4:17 am |
हमने तो पहले ही कहा था कि प्रीपेड आटो ले लेना, वो तो तुम्हे याद नहीं रहा होगा
और सुनाओ, जिमखाना कैण्टीन पर गोभी मंचूरियन खायी या नहीं ? खाना कौन सी मैस में खा रहे हो? कुछ लडकियों की गुणवत्ता के बारे में कहो, हमारे जमाने में तो केवल जीव विज्ञान संकाय की लडकियाँ ही बढिया हुआ करती थी ।
M.T.R. अभी तक गये कि नहीं?
November 24, 2007 at 11:57 am |
प्रीपेड ऑटो लेना याद तो था पर वहाँ एक नजर में साला दिखा ही नहीं कहाँ है| खैर पहले ही दिन दीपक और चंदू आए थे उन्हीं के साथ जिमखाना कैंटीन पर गोभी मंचूरियन भी खाया था| यहीं पर जे. एन. सी. की मेस में खा रहा हूँ इसलिए सुबह ८ बजे से रात ९ बजे तक जे. एन. सी. में ही रहता हूँ| अभी तक आई. आई. एस. सी. की लडकियों को देखने का अधिक अवसर नहीं मिला है परन्तु जे. एन. सी. की गुणवत्ता उत्साहवर्द्धक नहीं है|
कल रविवार को पूरी छुट्टी मनानी है तभी शायद एम. टी. आर. भी जाऊंगा|