वूमेन ऑन टॉप

अक्सर अंग्रेजी अखबारों में आपने देखा होगा कि किसी महिला के ऊंचे ओहदे तक पहुँचने की ख़बर को “वूमेन ऑन टॉप” शीर्षक के साथ छापा जाता है; कम से कम टाइम्स ऑफ़ इंडिया के साथ तो ऐसा ही है| चाहे वो प्रतिभा ‘ताई’ के राष्ट्रपति बनने की ख़बर हो या फिर इंदिरा नूयी की किसी बिज़नेस उपलब्धि की बात हो| मेरे समझ में नहीं आता कि दरअसल ये लोग इस शीर्षक से क्या जाहिर करना चाहते हैं| क्या आपको कुछ समझ आता है इसका तात्पर्य? वैसे मुझे कभी-कभी कुछ आभास जरूर होता है कि कुछ तो है जोकि ये लोग इस वाक्यांश से जताना चाहते हैं, पर मैं इस आभास को शब्द जाल में नहीं बुन पा रहा हूँ| वैसे पुरूष प्रधान समाज से ऐसी बातों की अपेक्षा की जा सकती है| कोई पुरूष चाहे जितना भी आधुनिक, उदारवादी या फ़िर लिंगभेद को न मानने वाला हो पर अपने ऊपर एक स्त्री को देख कर असहज हो जाता है| भले ही कुछ समय में वो अपने आप का ढाल ले और इसे स्वीकार कर ले परन्तु यह ‘कुछ समय’ किसी के लिए भी शून्य नहीं हो सकता| इसके लिए किसी को दोषभावना से ग्रसित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम ऐसे माहौल में बड़े हुए हैं जिसमें इस प्रकार की भावनाओं का मन में आना एकदम नैसर्गिक है| यहाँ पर मैं कानपुर के एक रेस्त्राँ का किस्सा बताना चाहूँगा| यदि देश के अन्य महानगरों के तुलना की जाय तो कानपुर को अभी भी काफ़ी पिछड़ा हुआ ही कहा जायेगा| हुआ कुछ यूँ कि हम लोग एक डिनर पार्टी में गए थे, उस रेस्त्राँ में एक बार भी था| कुछ देर बाद हमने देखा कि वहाँ एक लड़की अपने पिता (सम्भवतः) के साथ आयी और उन्होंने बार पे जाकर कुछ मंगाया| इतना सब देख कर हमारे मित्रों में इस बात पर चर्चा शुरू हो गयी कि “उसे लड़की होते हुए ऐसे करना चाहिए?” अगर देखा जाय तो उसने उतना ही ग़लत किया जितना कि उसका भाई (यदि हो तो) कर सकता था, परन्तु यदि उसकी जगह उसका भाई होता तो शायद हममें से कोई ध्यान भी न देता, बहस तो बड़े दूर की बात है| संभवतः ये “वूमेन ऑन टॉप” भी इसी असहजता का परिणाम है|

2 Responses to “वूमेन ऑन टॉप”

  1. ज्ञानदत पाण्डेय Says:

    देश काल के हिसाब से है। समय के साथ यह भी सहज हो जायेगा।

  2. kakesh Says:

    सहमत हूँ आपसे.

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