बंगलुरू आने के बाद से यहाँ की काफ़ी कम चीजें ही मुझे प्रभावित कर पायी हैं उनमें से एक है यहाँ की सरकारी सड़क परिवहन सेवा| यदि आप बंगलुरू के आस पास कहीं भी घूमने जाना चाहते हैं तो कर्नाटक राज्य पर्यटन विकास निगम की वेबसाइट से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और उसके द्वारा संचालित पैकेज यात्रा का भी लाभ उठा सकते हैं| आसपास के लगभग सभी रमणीय स्थानों के लिए यहाँ से पैकेज यात्राएं उपलब्ध हैं| साथ ही यदि आप किसी निकटवर्ती स्थान (तीन-चार सौ किलोमीटर तक) पर जाने के लिए राज्य सड़क परिवहन सेवा का लाभ उठाना चाहते हों तो भारतीय रेलवे की भाँति ही इसका भी टिकट ऑनलाइन बुक कर सकते हैं| परन्तु ऑटो रिक्शा से मेरे कई कटु अनुभव रहें हैं इसलिए मैं इसके प्रति सभी को सचेत करना अपना कर्तव्य समझता हूँ| अधिकतर ऑटो रिक्शा चालक आपसे बोलेंगे कि मीटर काम नहीं कर रहा है| अब कल ही की बात ले लीजिये पहले तो आई. आई. एस सी. से मल्लेश्वरम जाने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ फ़िर जब तैयार हुआ तो २.५ किलोमीटर के ३० रुपये मांगे (नियमानुसार १५ रुपये बनते हैं) और जब हमलोग तैयार भी हो गए ३० रुपये देने को तो गंतव्य स्थान पर पहुँच कर वह ४० रुपये की माँग करने लगा| यहाँ पर गौर करने वाली बात यह थी कि यात्रा से पहले व यात्रा के दौरान उसे हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान नहीं था परन्तु पैसे मांगने के लिए उसे पता नहीं कैसे हिन्दी आ गयी| मैं जानता हूँ कि इस घटना का सामान्यीकरण करना उचित नहीं है परन्तु यदि आपके अधिकतर अनुभव ऐसे ही हों तब और किया भी क्या जा सकता है? वैसे सुना है कि यदि आपको स्थानीय भाषा का ज्ञान है तो उनका व्यवहार एकदम विपरीत होता है| सही है एक और रेसियल डिस्क्रिमिनेशन देखने को मिला|
December 12, 2007 at 8:57 pm |
निन्दापुराण जी, यही भेद उत्तर भारत के ऑटो वाले हिन्दी न जानने वालों के साथ करते हैं। ऑटो वाले ही क्यों, वह तो शुरुआत है।
जब तक अपने पर नहीं गुज़रती तब तक हम यही कहते हैं कि भई हिन्दी सीख लो, ऐसे समय में हम – कम से कम मैं – यह क्यों नहीं सोचता कि बेंगलोर में रह रहा हूँ तो कन्नड़ सीख लूँ