रचना: हसरत मोहानी
स्वर: ग़ुलाम अली
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बाहज़ारां इज़्तिराब-ओ-सदहज़ारां इश्तियाक
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगाना याद है
(बाहज़ारां == हज़ार बार, इज़्तिराब == चिन्ता, सदहज़ारां == एक बार, इश्तियाक == मुलाकात)
(अर्थात् एक बार मिलने के लिये हज़ार बार की बेचैनी)
तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा (बेबाक = स्पष्ट बोलना)
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है
खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़्फ़ातन (दफ़्फ़ातन == अचानक)
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छिपाना याद है
जानकर सोता तुझे वो क़सा-ए-पाबोसी मेरा
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है
(क़सा-ए-पाबोसी = पैर चूमने की कोशिश)
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
(अज़्राह-ए-लिहाज़ == सावधानी से)
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना ना था
सच कहो क्या तुम को भी वो कारखाना याद है
(कारखाना == युग, समय)
ग़ैर की नज़रों से बचकर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरीछिपे रातों को आना याद है
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है
(वस्ल == मुलाक़ात, ज़िक्र-ए-फ़िराक़ == जुदाई का ज़िक्र)
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है
(बर्गश्ता = रूठा हुआ)
चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
बेरुख़ी के साथ सुनाना दर्द-ए-दिल की दास्तां
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है
वक़्त-ए-रुख़सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है
बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्तक़ा ‘हसरत’ मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है
(इद्दा-ए-इत्तक़ा = धर्मनिष्ठता की शपथ, अहद-ए-हवस = चाहत के दिनों)
स्रोत: फ़ंडू ज़ोन चर्चा समूह
यह यू-ट्यूब वीडियो ग़ुलाम अली साहब के एक सजीव कार्यक्रम की रिकार्डिंग है। यद्यपि उन्होनें इस वीडियो में पूरी ग़ज़ल नहीं गायी है फ़िर भी यह “निक़ाह” फ़िल्म के गाने से बड़ा है।
January 28, 2008 at 11:15 pm |
बहुत खूबसूरत। बड़े दिनों बाद सुनकर बहुत सुकून मिला।
March 28, 2009 at 4:08 pm |
this gazal is one of the finestand bestest gazal by Gulam ali