मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

February 24, 2008

रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: नूरजहाँ

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है (2)
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
(दरख़्शाँ == रोशन, हयात == ज़िन्दगी, ग़म-ए-दहर == दुनिया भर के ग़म, आलम == दुनिया, सबात == स्थिरता, निगूँ == झुकना, फ़क़त == सिर्फ, वस्ल == मुलाकात)

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुये कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुये ख़ून में नहलाये हुये
जिस्म निकले हुये अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुये नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
(तारीक == अंधेरा, बहीमाना == डरावना, तलिस्म == जादू, अतलस == साटन का कपड़ा, कमख़्वाब == जरीदार वस्त्र, जा-ब-जा == जगह-जगह, अमराज़ == घाव, तन्नूर == भट्ठी)

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

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वो जो हम में तुम में क़रार था

February 23, 2008

रचना: मोमिन ख़ान मोमिन
स्वर: नय्यारा नूर / बेग़म अख़्तर / ग़ुलाम अली

वो जो हम में तुम में क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो नये गिले वो शिकायतें, वो मज़े मज़े की हिकायतें
वो हर एक बात पे रूठना, तुम्हें याद हो के न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई, जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना, तुम्हें याद हो के न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आपका
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो के न याद हो

हुए इत्तेफ़ाक़ से गर बहम, वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर, वो करम के हाथ मेरे हाथ पर
मुझे सब हैं याद ज़रा ज़रा, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी बैठे सब हैं जो रू-ब-रू, तो इशारतों ही से गुफ़्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का
वो नहीं नहीं की हर आन अदा, तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना, जिसे आप कहते थे बेवफ़ा
मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तला, तुम्हें याद हो के न याद हो

नय्यारा नूर

बेग़म अख़्तर (केवल ऑडियो)


कथक नृत्यांगना पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण

February 22, 2008

स्पिक मैके के कानपुर अध्याय के द्वारा आई.आई.टी कानपुर में आयोजित एक नृत्य संध्या में आज सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण का नृत्य देखने का अवसर मिला। आपने नृत्य शिक्षा पंडित बिरजू महाराज से ली और आज एक स्थापित कथक गुरु के रूप में जानी जाती हैं। लगभग डेढ़ घंटे तक चले कार्यक्रम में उन्होंने अपने सुनियोजित और विलक्षण नृत्य से समां बाँध दिया। कथक एक ऐसा नृत्य है जिसमें अभिनय और चेहरे के भावों के माध्यम से कथा वाचन किया जाता है। कथक के बारे में कुछ मूलभूत जानकारी के अलावा कथक के कुछ नमूने प्रस्तुत किये गये जिनमे से द्रोपदी चीर हरण, ओहम और यशोधरा (सखी वे मुझ से कह कर जाते…) उल्लेखनीय हैं।

पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण


मैं ख़याल हूँ किसी और का

February 21, 2008

रचना: सलीम कौसर
स्वर: मेहदी हसन

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मेरा अक्स है पस-ए-आइना कोई और है

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है

कभी लौट आयें तो न पूछना सिर्फ़ देखना बड़े ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है

अजब ऐतबार-ब-ऐतबारी के दर्मियाँ है ज़िन्दगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है

वही मुन्सिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोईऔरथा पर मेरी सज़ा कोई और है

तेरी रोशनी मेरी ख़द्दो-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है

तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक़याँ कोई और है

जो मेरी रियाज़त-ए-नीमशब को “सलीम” सुबह न मिल सकी
तो फिर इस के माने तो ये हुए के यहाँ ख़ुदा कोई और है

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पहला भाग (6:00 मिनट)

दूसरा भाग (4:54 मिनट)


ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर

February 20, 2008

रचना: अख़्तर शिरानी
स्वर: नय्यारा नूर

ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर बरबाद न कर

ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें, हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद हैं हम, तू और हमें नाशाद न कर
क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ, ये ताज़ा सितम इजाद न कर
यूँ ज़ुल्म न कर बेदाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(नाशाद == उदास, बेदाद == अन्याय)

जिस दिन से मिले हैं दोनों का, सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुबह गई, आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
हाथों से ख़ुशी का जाम छूटा, होंठों से हँसी का नाम गया
ग़म्ग़ीं न बना नाशाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(फ़रोग ==चिराग़, ग़म्ग़ीं == दुःख में डूबा)

रातों को उठ उठ कर रोते हैं, रो रो के दुआएँ करते हैं
आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश, सर धुनते हैं आहें भरते हैं
ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा, जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं
ये ज़ुल्म तो ऐ जल्लाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(तसव्वुर == उम्मीद, ख़लिश == दर्द, बेचैनी)

जिस दिन से बँधा है ध्यान तेरा, घबराये हुये से रहते हैं
हर वक़्त तसव्वुर कर कर के, शर्माये हुये से रहते हैं
कुम्हलाये हुये फूलों की तरह, कुम्हलाये हुये से रहते हैं
पामाल न कर बेदाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(पामाल == पैरों तले कुचलना)

ये रोग लगा है जबसे हमें, रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो
हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश, बेख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो
जीने से इधर बेज़ार हूँ मैं मरने पे उधर तय्यार है वो
और ज़ब्त कहे फ़रियाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(रंजीदा == असंतुष्ट, बेदार == चौकन्ना, बेज़ार == अप्रसन्न, ज़ब्त == अधिग्रहण)

बेदर्द ज़रा इन्साफ़ तो कर, इस उम्र में और मग़मूम है वो
फूलों की तरह नाज़ुक है अभी, तारों की तरह मासूम है वो
ये हुस्न सितम ये रंज ग़ज़ब, मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो
मज़लूम पे यूँ बेदाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(मग़मूम == दुःखी, रंज == दुःख, मज़लूम == दुःखियारा)

ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं, वो शोख़ हसीं बदनाम न हों
वो माह-ए-लक़ा बदनाम न हो, वो ज़ोहरा-जबीं बदनाम न हो
नामूस का उस को पास रहे, वो पर्दा-नशीं बदनाम न हो
उस पर्दा-नशीं को याद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(शोख़ == आकर्षक, नामूस == इज्जत, पर्दा-नशीं == पर्दे में रहने वाली)

उम्मीद की झूठी जन्नत के, रह रह के न दिखला ख़्वाब हमें
आईंदा के फ़र्ज़ी इशरत के, वादे से न कर बेताब हमें
कहता है ज़माना जिस को ख़ुशी, आती है नज़र कामयाब हमें
छोड़ ऐसी ख़ुशी को याद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(इशरत == खुशी)

दो दिन में ही अहद-ए-तिफ़ली के, मासूम ज़माने भूल गये
आँखों से वो ख़ुशियाँ मिट सी गयीं, लब के वो तराने भूल गये
उन पाक बहिश्ती ख़्वाबों के, दिलचस्प फ़साने भूल गये
उन ख़्वाबों से यूँ आज़ाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(तिफ़ली == यौवन, बहिश्त == जन्नत)

आँखों को ये क्या आज़ार हुआ, हर जज़्ब-ए-निहाँ पर रो देना
आहंग-ए-तरब पे झुक जाना, आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ पर रो देना
बरबत की सदा पर रो देना, मुतरिब के बयाँ पर रो देना
एहसास को ग़म बुनियाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(आज़ार == परेशानी, निहाँ ==छुपा हुआ, आहंग == लय, तरब == आनन्द,
फ़ुग़ाँ == कराह, बरबत == बीन, मुतरिब == गायक/गायिका)

जी चाहता है इक दूसरे को, यूँ आठ पहर हम करें
आँखों में बसायें ख़्वाबों को, और दिल को ख़याल आबाद करें
ख़िल्वत में भी जो जल्वत का सामाँ, वहदत को दुई से शाद करें
ये आरज़ूएं इजाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(ख़िल्वत == एकान्त, वहदत == बेजोड़, शाद == मग्न)

वो राज है ये ग़म आह जिसे, पा जाये कोई तो ख़ैर नहीं
आँखों से जब आँसू बहते हैं, आ जाये कोई तो ख़ैर नहीं
ज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ, भा जाये कोई तो ख़ैर नहीं
है ज़ुल्म मगर फ़रियाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर

दुनिया का तमाशा देख लिया, ग़म्ग़ीं सी है बेताब सी है
उम्मीद यहाँ इक वहम सी है, तस्कीन यहाँ इक ख़्वाब सी है
दुनिया में ख़ुशी का नाम नहीं, दुनिया में ख़ुशी नायाब सी है
दुनिया में ख़ुशी को याद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(तस्कीन == सुख)

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