स्वर: ग़ुलाम अली
गीतकार: आनन्द बख्शी
फ़िल्म: आवारगी
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को…
मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहाँ सारा बना डाला
चमकते चाँद को…
मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को…
यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को…
यहाँ क्लिक करके सुनिये:
September 25, 2008 at 3:25 am |
नमस्कार,
आपका ब्लाग वाकई में लाजबाब है , मै ग़ुलाम अली की गजलो को ढूंढ़ता यहाँ तक पहुँचा | काफी सराहनीये प्रयास |
ध्नायाद
निशांत