पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन

रचना : परवीन शाकिर

पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन
दस्त-बस्ता शहर में खोले मेरी ज़ंजीर कौन
(पा-ब-गिल == बँधे हुये, तदबीर == रास्ता, दस्त-बस्ता == बँधे हाथ)

मेरा सर हाज़िर है लेकिन मेरा मुंसिफ़ देख ले
कर रहा है मेरी फ़र्द-ए-जुर्म को तहरीर कौन
(मुंसिफ़ == न्यायाधीश, फ़र्द == लेखा, तहरीर == लिखाई)

मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तनहाई में
बेरिदाई को मेरी फिर दे गया तशहीर कौन
(तशहीर == बदनामी, विज्ञापन)

आज दरवाज़ों पे दस्तक जानी पहचानी सी है
आज मेरे नाम लाता है मेरी ताज़ीर कौन
(ताज़ीर == सज़ा)

नींद जब ख़्वाबों से प्यारी हो तो ऐसे अहद में
ख़्वाब देखे कौन और ख़्वाबों को दे ताबीर कौन
(अहद == समय, ताबीर == व्याख्या)

रेत अभी पिछले मकानों की न वापस आई थी
फिर लब-ए-साहिल घरौंदा कर गया तामीर कौन
(लब-ए-साहिल == किनारे पर, तामीर == बनाना)

सारे रिश्ते हिज्रतों में साथ देते हैं तो फिर
शहर से जाते हुये होता है दामनगीर कौन

दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं
देखना है खेंचता है मुझ पे पहला तीर कौन

पेश है एक मुशायरे की वीडियो रिकार्डिंग यू-ट्यूब पर:

परवीन शाकिर: एक संक्षिप्त परिचय (स्रोत)
जन्म: २४ नवम्बर १९५२, कराची
मृत्यु: २६ दिसम्बर १९९४, इस्लामाबाद (सड़क दुर्धटना)
शिक्षा: पी-एच.डी, अंग्रेजी भाषा और बैंक प्रबंधन में स्नातकोत्तर उपाधि
पेशा: पहले ९ साल तक अध्यापिका, फिर पाकिस्तानी लोकसेवा के कर विभाग में
प्रकाशित कविता संग्रह: खुशबू (१९७६), सद-बर्ग (१९८०), ख़ुद-कलामी (१९९०), इन्कार (१९९०) और माह-ए-तमाम (१९९४)
सम्मान: अदामजी अवार्ड (खुशबू के लिए), प्राइड ऑफ़ परफॉर्मेंस अवार्ड (पाकिस्तानी सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान)
उस्ताद: अहमद नदीम कासमी
कलमी नाम: ‘बीना’

3 Responses to “पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन”

  1. मीत Says:

    इतनी अच्छी ग़ज़ल एक मुद्दत में नहीं मिली थी पढने को . बहुत बहुत शुक्रिया आप का.

  2. नीरज रोहिल्ला Says:

    सही जा रिये हो बन्धु, लगभग रोज ही एक जानदार प्रस्तुति के साथ,

  3. विनय प्रजापति Says:

    हम कौन हैं जो कहें उनको सबसे अच्छा
    ज़माने में उनको अच्छा कहने वाले और हैं

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