रचना: नवाब बहादुर शाह ज़फ़र
स्वर: हबीब वली मोहम्मद
शमशीर बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी है
जूड़े की गुंधावट बहर-ए-ख़ुदा ज़ुल्फ़ों की लटक फिर वैसी है
(शमशीर== तलवार, बरहना == नंगी/खाली, बहर-ए-ख़ुदा == ख़ुदा के लिये)
हर बात में उसकी गर्मी है हर नाज़ में उस के शोख़ी है
आमद है क़यामत चाल भरी चलने की फड़क फिर वैसी है
(आमद == आना, पहुँचना)
महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट
जाली की ये कुरती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी है
(महरम == जान पहचान, हबाब == बुलबुला, आब-ए-रवाँ == बहता हुआ पानी)
वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल
नाच उसका उठाये सौ फ़ितने घुंघरू की छनक फिर वैसी है
(फ़ितने == दंगे/फ़साद)
श्याम बेनेगल की फ़िल्म मण्डी (1983) से
February 16, 2008 at 9:04 am |
वाह अंकुर । प्रीती सागर ने इसे बिल्कुल ऐसा का ऐसा गाया है श्याम बेनेगल की फिल्म मंडी में । पर हबीब वली जिंदाबाद ।
February 16, 2008 at 8:16 pm |
भाई अंकुर साहब, एकदम मस्त कर दिया आप ने तो. मज़ा आ गया, शुक्रिया. मैं भी यूनुस भाई से पूरी तरह से सहमत हूँ : दोनों ही versions बाकमाल हैं लेकिन हबीब वली मोहम्मद तो बस – ज़िन्दाबाद.