दाग़-ए-दिल हमको याद आने लगे

रचना: बाक़ी सिद्दीक़ी
स्वर: इक़बाल बानो

दाग़-ए-दिल हमको याद आने लगे
लोग अपने दिये जलाने लगे

ख़ुद फ़रेबी सी ख़ुद फ़रेबी है
पास के ढोल भी सुहाने लगे

अब तो होता है हर क़दम पे ग़ुमाँ
हम ये कैसा क़दम उठाने लगे

एक पल में वहाँ से हम उठे
बैठने में जहाँ ज़माने लगे

अपनी क़िस्मत से है मक्कर किसको
तीर पर उड़के भी निशाने लगे

कुछ न पाकर भी मुतमईं हैं हम
इश्क़ में हाथ क्या खजाने लगे
(मुतमईं == संतुष्ट)

One Response to “दाग़-ए-दिल हमको याद आने लगे”

  1. समीर लाल Says:

    बहुत उमदा प्रस्तुति. सुनने में अलग आनन्द है. आभार पेश करने का,

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