स्वर: उस्ताद अमानत अली ख़ान
होंठों पे कभी उन के मेरा नाम ही आये
आये तो सही बर-सर-ए-इल्ज़ाम ही आये
(बर == पर)
हैरान हैं लब बस्ता हैं दिलग़ीर हैं गुन्चे
ख़ुशबू की ज़ुबानी तेरा पैग़ाम ही आये
(लब बस्ता == होंठ बन्द होना, दिलग़ीर == उदास, गुन्चे == कली)
लम्हात-ए-मुसर्रत हैं तसव्वुर से गुरेज़ाँ
याद आये हैं जब बागम-ओ-आलम ही आये
(लम्हात-ए-मुसर्रत == खुशी के पल, तसव्वुर == इच्छा, गुरेज़ाँ == दूर भागना)
तारों से सज़ा लेंगे रह-ए-शहर-ए-तमन्ना
मक़दूर नहीं सुबहो चलो शाम ही आये
(मक़दूर == समर्थ होना)
यादों के वफ़ाओं के अक़ीदों के ग़मों के
काम आये जो दुनिया में तो इस नाम ही आये
(अक़ीदा == विश्वास)
क्या राह बदलने का ग़िला हम सफ़रों से
जिस रह से चले तेरे दर-ओ-बाम ही आये
(बाम == छज्जा)
थक हार के बैठे हैं सर-ए-कू-ए-तमन्ना
काम आये तो फिर जज़्बा-ए-नाकाम ही आये
बाक़ी न रहे साख़ अदा दश्त-ए-जुनूँ की
दिल में अगर अंदेशा-ए-अंजाम ही आये
१९२२ में जन्मे उस्ताद अमानत अली ख़ान, अख़्तर हुसैन ख़ान के पुत्र तथा पटियाला घराने के स्थापक अली बख़्श ख़ान के पौत्र थे।