मैं ख़याल हूँ किसी और का

रचना: सलीम कौसर
स्वर: मेहदी हसन

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मेरा अक्स है पस-ए-आइना कोई और है

मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है

कभी लौट आयें तो न पूछना सिर्फ़ देखना बड़े ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है

अजब ऐतबार-ब-ऐतबारी के दर्मियाँ है ज़िन्दगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है

वही मुन्सिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोईऔरथा पर मेरी सज़ा कोई और है

तेरी रोशनी मेरी ख़द्दो-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है

तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक़याँ कोई और है

जो मेरी रियाज़त-ए-नीमशब को “सलीम” सुबह न मिल सकी
तो फिर इस के माने तो ये हुए के यहाँ ख़ुदा कोई और है

यू-ट्यूब वीडियो:
पहला भाग (6:00 मिनट)

दूसरा भाग (4:54 मिनट)

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