मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था

स्वर: नय्यारा नूर 

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था, सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ
मेरी आँख कैसे छलक गयी, मुझे रंज है ये बुरा हुआ
(ज़ब्त == धैर्य, सर-ए-बज़्म == महफ़िल में, रंज == व्यथा/ दुःख)

जो नज़र बचा के गुज़र गये, मेरे सामने से अभी अभी
ये मेरे ही शहर के लोग थे, मेरे घर से घर है मिला हुआ

मेरी ज़िन्दगी के चिराग का, ये मिजाज़ कुछ नया नहीं
अभी रोशनी अभी तीरगी, ना जला हुआ ना बुझा हुआ
(तीरगी == अंधेरा)

मुझे हमसफ़र भी मिला कोई, तो शिकस्ता हाल मेरी तरह
कई मंजिलों का थका हुआ, कई रास्तों का लुटा हुआ

मुझे जो भी दुश्मन-ए-जाँ मिला, वो ही पुख़्ताकार जफ़ा मिला
न किसी के जख़्म गलत पड़े, न किसी का तीर ख़ता हुआ
(पुख़्ताकार जफ़ा == अत्याचार में निपुण)

मुझे रास्ते मे पड़ा हुआ, एक अजनबी का खत मिला
कहीं खून-ए-दिल से लिखा, हुआ कहीं आँसुओं से मिटा हुआ

3 Responses to “मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था”

  1. MEET Says:

    बहुत बहुत शुक्रिया अंकुर साहब. क्या सुनवा दिया सुबह सुबह. वल्लाह !
    “अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
    कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं”

  2. parulk Says:

    sunvaaney ka shukriyaa….

  3. mehhekk Says:

    bahut sundar

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