रचना: क़तील शिफ़ाई
स्वर: मुन्नी बेग़म
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
किसको ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं
माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं
टूट गया जब दिल तो फिर साँसों का नग़मा क्या माने
गूँज रही है क्यों शहनाई जब कोई बारात नहीं
ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो
जिसमें कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं
मेरे ग़मग़ीं होने पर एहबाब हैं यूँ हैरान ‘क़तील’
जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं
Posted by अंकुर वर्मा