स्वर: बलक़ीस ख़ानुम / टीना सानी
अनोखा लाड़ला
खेलन को माँगे चाँद रे
अनोखा लाड़ला
कैसी अनोखी बात रे
अनोखा लाड़ला
तन के घाव तो भर गये दाता
मन का घाव नहीं भर पाता
जी का हाल समझ नहीं आता
कैसी अनोखी बात रे
अनोखा लाड़ला
खेलन को माँगे चाँद रे
अनोखा लाड़ला
प्यास बुझे कब इक दर्शन में
तन सुलगे बस एक लगन में
मन बोले रख लूँ नयनन में
कैसी अनोखी बात रे
अनोखा लाड़ला
खेलन को माँगे चाँद रे
अनोखा लाड़ला
जिस पे न बीती वो कब जाने
जग वाले आये समझाने
पागल मन कोई बात न माने
कैसी अनोखी बात रे
अनोखा लाड़ला
खेलन को माँगे चाँद रे
अनोखा लाड़ला
March 10, 2008 at 2:54 pm |
बढिया प्रस्तुति प्रेषित की है।
March 10, 2008 at 10:06 pm |
http://youtube.com/watch?v=qF-BxJd6htA
इसे भी देखो….किसी ने पूरे मन से गाया है और सुर को भी बखूबी निबाहा है ।