ये क्या के एक जहाँ को
March 13, 2008रचना: सूफ़ी ग़ुलाम मुस्तफ़ा तबस्सुम
स्वर: फ़रीदा ख़ानुम
ये क्या के एक जहाँ को करो वक़्फ़-ए-इज़्तराब
ये क्या के एक दिल को शकेबाँ न कर सको
(वक़्फ़-ए-इज़्तराब == बेचैनी की विरासत, शकेबाँ == आराम देना)
ऐसा न हो ये दर्द बने दर्द-ए-लाज़वल
ऐसा न हो के तुम भी मुदावा न कर सको
(दर्द-ए-लाज़वल == लाइलाज मर्ज, मुदावा == इलाज)
शायद तुम्हें भी चैन न आये मेरे बग़ैर
शायद ये बात तुम भी गवारा न कर सको
क्या जाने फिर सितम भी मयस्सर हो न हो
क्या जाने ये करम भी करो या न कर सको
(मयस्सर == संभव/मुमकिन)
अल्लाह करे जहाँ को मेरी याद भूल जाय
अल्लाह करे के तुम कभी ऐसा न कर सको
मेरे सिवा किसी की न हो तुम को जुस्तजू
मेरे सिवा किसी की तमन्ना न कर सको
(जुस्तजू == इच्छा/चाह)
Posted by अंकुर वर्मा