स्वर: बल्क़ीस ख़ानुम
कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या
कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को
फिर जख़्म अगर महकाओ तो क्या
मैं तनहा था मैं तनहा हूँ
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या
जब हम ही न महके फिर साहब
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या
(बाद-ए-सबा == सुबह की हवा/ पछुआ पवन)
March 14, 2008 at 1:04 pm |
इस गजल को सुनाने के लिए बहुत-बहुत आभार।