रचना: इब्ने इंशा
स्वर: उस्ताद अमानत अली ख़ान
इंशा जी उठो अब कूच करो
इस शहर में दिल को लगाना क्या
इस दिल के दरीदा दामन में
देखो तो सही सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुये
उस झोली का फ़ैलाना क्या
शब बीती चाँद भी डूब चला
जंज़ीर पड़ी दरवाजे में
क्यों देर गये घर आये हो
सजनी से करोगे बहाना क्या
जब शहर के लोग न रस्ता दें
क्यों बन में न जा विश्राम करें
दीवानों की सी न बात करे
तो और करे दीवाना क्या
March 15, 2008 at 9:11 am |
amazing… gr8 collection…
March 15, 2008 at 9:55 am |
एक बहुत उम्दा रचना उपलब्ध कराने के लिए मेरे आभार स्वीकार करें.
कोई दसेक बरस पहले एक बस में यात्रा करते हुए एक अद्भुत ड्राइवर से पाला पडा था. कोई सात घण्टे की यात्रा में उसने जो गाने बजाए, उनमें एक भी गाना ऐसा नहीं था, जिसे ज़रा-सा भी निम्न स्तरीय कहा जा सके. लेकिन जो सबसे बढिया चीज़ उसने सुनवाई, और जो मुझे अब तक याद है, वह इंशा जी की यही नज़्म थी. साबरी बन्धुओं की गाई हुई. तब से अब तक न जाने कितने म्यूज़िक स्टोर्स और दोस्तों के संग्रहों को खंगाल चुका हूं कि वह चीज़ मिल जाए, लेकिन अब तक तो सफल नहीं हुआ हूं. आपने यह सुनवाया तो यह सब याद आ गया.
March 15, 2008 at 8:35 pm |
nice one