मरीज़-ए-मोहब्बत उन्हीं का फ़साना

रचना: क़मर जलालवी
स्वर: मुन्नी बेग़म / अज़ीज़ मियाँ

मरीज़-ए-मोहब्बत उन्हीं का फ़साना
सुनाता रहा दम निकलते निकलते
मगर ज़िक्र-ए-शाम-ए-अलम जब भी आया
चिराग़-ए-सहर बुझ गया जलते जलते

इरादा था तर्क-ए-मुहब्बत का लेकिन
फ़रेब-ए-तबस्सुम में फिर आ गये हम
अभी खाके ठोकर सम्भलने न पाये
कि फिर खाई ठोकर सम्भलते सम्भलते

उन्हें ख़त में लिखा था दिल मुज़्तरिब है
जवाब उन का आया मुहब्बत न करते
तुम्हें दिल लगाने को किसने कहा था
बहल जायेगा दिल बहलते बहलते

अरे कोई वादा ख़िलाफ़ी की हद है
हिसाब अपने दिल में लगाकर तो देखो
क़यामत का दिन आ गया रफ़्ता रफ़्ता
मुलाक़ात का दिन बदलते बदलते

हमें अपने दिल की तो परवाह नहीं है
मगर डर रहा हूँ ये कमसिन की ज़िद है
कहीं पा-ए-नाज़ुक में मोच आ न जाय
दिल-ए-साक-ए-जाँ को मसलते मसलते

वो मेहमाँ रहे भी तो कब तक हमारे
हुयी शम्मा गुल और डूबे सितारे
‘क़मर’ इस क़दर उन को जल्दी थी घर की
वो घर चल दिये चाँदनी ढलते ढलते

अज़ीज़ मियाँ

2 Responses to “मरीज़-ए-मोहब्बत उन्हीं का फ़साना”

  1. arvind mishra Says:

    बहुत खूब भाई ,अगर यही निंदा पुराण है तो फिर तो बार बार दिल यहाँ आने को चाहेगा

  2. MEET Says:

    क्या बात है मालिक. शानदार सुबह.

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