गोरी करत सिंगार

March 24, 2008

रचना: परवीन शाक़िर
स्वर: बल्क़ीस ख़ानुम

गोरी करत सिंगार बाल बाल मोती चमकाये
रोम रोम महकाये गोरी करत सिंगार

मांग सिंदूर की सुन्दरता से चमके चंदन हार
जूड़े में जूही की बेली बाँह में हार सिंगार
गोरी करत सिंगार

कान में जगमग बाली पत्ता गले में जुगनू हार
संदल ऐसी पेशानी पर बिंदिया लायी बहार
गोरी करत सिंगार

सब्ज़ कटारा सी आँखों में कजरे की दो धार
गालों की सुर्खी में झलके हिरनी का इक़रार
गोरी करत सिंगार