रचना: परवीन शाक़िर
स्वर: बल्क़ीस ख़ानुम
गोरी करत सिंगार बाल बाल मोती चमकाये
रोम रोम महकाये गोरी करत सिंगार
मांग सिंदूर की सुन्दरता से चमके चंदन हार
जूड़े में जूही की बेली बाँह में हार सिंगार
गोरी करत सिंगार
कान में जगमग बाली पत्ता गले में जुगनू हार
संदल ऐसी पेशानी पर बिंदिया लायी बहार
गोरी करत सिंगार
सब्ज़ कटारा सी आँखों में कजरे की दो धार
गालों की सुर्खी में झलके हिरनी का इक़रार
गोरी करत सिंगार
March 24, 2008 at 9:54 pm |
क्या बात है. शुक्रिया सर जी.
March 25, 2008 at 9:51 am |
वाह जी!! आनन्द आ गया. बहुत आभार इस प्रस्तुति का.
March 26, 2008 at 6:54 am |
वाह ,शुक्रिया !
March 28, 2008 at 7:57 pm |
bahut badhiyaa…sunvaaney ka shukriyaa