रचना: अक़बर इलाहाबादी
स्वर: नय्यारा नूर
कहूँ किससे क़िस्सा-ए-दर्द-ओ-ग़म, कोई हमनशीं है न यार है
जो अनीस है तेरी याद है जो शफ़ीक़ है दिलज़ार है
तू हज़ार करता लगावटें मैं कभी न आता फ़रेब में
मुझे पहले इसकी ख़बर न थी तेरा दो ही दिन का ये प्यार है
ये नवीद औरों को जा सुना हम असीर-ए-नाम हैं ऐ सबा
हमें क्या चमन है जो रंग पर हमें क्या जो फ़सल-ए-बहार है
मुझे रहम आता है देखकर तेरा हाल ‘अक़बर’ रोहगर
तुझे वो भी चाहे ख़ुदा करे कि तु जिसका आशिक़-ए-ज़ार है
March 25, 2008 at 7:28 am |
आप के पोस्ट का इंतज़ार रहता है. धन्यवाद.
March 25, 2008 at 9:29 am |
sundar