स्वर: गुल बहार बानो
चाहत में क्या दुनियादारी, इश्क़ में कैसी मजबूरी
लोगों का क्या समझाने दो, उनकी अपनी मजबूरी
मैनें दिल की बात रखी और तूने दुनियावालों की
मेरी अर्ज़ भी मजबूरी थी उनका हुक़्म भी मजबूरी
रोक सको तो पहली बारिश की बूँदों को तुम रोको
कच्ची मिट्टी तो महकेगी है मिट्टी की मजबूरी
जब तक हँसता गाता मौसम अपना है सब अपने हैं
वक़्त पड़े तो याद आ जाती है मस्नूई मजबूरी
मुद्दत गुज़री इक वादे पर आज भी क़ायम है ‘मुहसिन’
हमने सारी उम्र निबाही, अपनी पहली मजबूरी
March 28, 2008 at 2:47 am |
अंकुर,
बडी नाजुक सी गजल सुनवायी आज तुमने, सुनकर बहुत अच्छा लगा ।
March 28, 2008 at 2:57 am |
“हमने सारी उम्र निभाई, अपनी पहली मजबूरी”
“हमने सारी उम्र निबाही, अपनी पहली मजबूरी ”
वादा निबाहा जाता है जैसे धोका खाया जाता है
ये और बात है दर्द-ए-डिस्को के दौर में कसमें निभायी जा रही हैं और धोखा खाया जा रहा है
March 28, 2008 at 6:42 pm |
waah…bahut khuub…pehli baar suni….fir kai baar suni…dhanywaad
February 14, 2009 at 10:55 am |
majboori to jaroorhi hai.kyonki ek dil ki dharkan logo ho sunae nahi dati par jab do dil dharakte hai to duniyawalo ko sunae deti hai.easliye baat dil se nikalkar duniyawaalo ke samane aa jati hai.