तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है

रचना: जिगर मुरादाबादी
स्वर: बेग़म अख़्तर

तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है

क़यामत क्या ये ऐ हुस्न-ए-दो आलम होती जाती है
के महफ़िल तो वही है, दिलकशी कम होती जाती है

वही मयखाना-ओ-सहबा, वही साग़र वही शीशा
मगर आवाज़-ए-नोशानोश मद्धम होती जाती है

वही है शाहिद-ओ-साक़ी, मगर दिल बुझता जाता है
वही है शम्मा लेकिन रोशनी कम होती जाती है

वही है ज़िन्दगी लेकिन ‘जिगर’ ये हाल है अपना
के जैसे ज़िन्दगी से ज़िन्दगी कम होती जाती है

3 Responses to “तबीयत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है”

  1. अनूप शुक्ल Says:

    वाह! वाह!

  2. समीर लाल Says:

    बहुत खूब प्रस्तुति. मजा आ गया.

  3. mamta Says:

    शुक्रिया इस प्रस्तुति के लिए।

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