रचना: बेहज़ाद लख़नवी
स्वर: नय्यारा नूर
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाये
मंज़िल के लिये दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाये
हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना
इस राह-ए-मुहब्बत में कोई दरपैश जो मुश्किल आ जाये
ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाये
ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंजिल आ जाये
अब क्यूँ ढूँढ़ू वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बला-ए-सितम
मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाये
इस जज़्ब-ए-दिल के बारे में एक मश्वरा तुम से लेता हूँ
उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मेरा दिल आ जाये
ऐ बर्क़-ए-तजली क्या तूने मुझको भी मूसा समझा है
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाये
आता है जो तूफ़ाँ आने दो कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाये
April 6, 2008 at 1:24 pm |
वाह ! मेरी बहुत ही पसंदीदा ग़ज़ल. शुक्रिया.