रचना: अक़बर इलाहाबादी
स्वर: ग़ुलाम अली
अंदाज़ अपने देखते हैं आइने में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता न हो
गिर पड़ा जाम यूँ हुआ महसूस
उनकी आँखों ने बद्दुआ दी है
हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाक़ा तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है
नातजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है
उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेग़ाना
मक़सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है
मैं तेरी मस्त निगाही का धरम रख लूँगा
होश आया भी तो कह दूँगा कि मुझे होश नहीं
वाँ दिल में कि सदमे दो याँ जी में के सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है
हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहे काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है
November 12, 2009 at 10:25 am |
Kindly correct the eleventh line. It is “Main teri mast nigahi ka bharam rakh loonga”.