बेचैन बहुत फिरना

रचना: मुनीर नियाज़ी
स्वर: ग़ुलाम अली

बेचैन बहुत फिरना घबराये हुए रहना
इक आग सी जज़बों की बहकाये हुए रहना

छलकाये हुए चलना ख़ुश्बू लब-ए-लाली की
इक बाग़ सा साथ अपने महकाये हुए रहना

उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आये
पर्दे में चले जाना शर्माये हुए रहना

इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से
इक चाँद सा आँखों में चमकाये हुए रहना

आदत ही बना ली है तुम ने तो ‘मुनीर’ अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताये हुए रहना

2 Responses to “बेचैन बहुत फिरना”

  1. arvind mishra Says:

    Video is not working -please check it !

  2. अंकुर वर्मा Says:

    मेरे यहाँ तो वीडियो भली भाँति चल रहा है, हाँ क्वालिटी जरूर थोड़ी खराब है। सम्भवतः इन्टरनेट कनेक्शन गति कारण हो सकती है इस असुविधा की। पुनः प्रयास करें, शायद इस बार चल जाय्।

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