एक अरसा हो गया है कुछ लिखे हुये, किसी की निंदा किये। यह सोचकर मन को बहला रहे थे कि आजकल व्यस्तता कुछ अधिक रहने लगी है। पर कारण शायद विषयाभाव था। आज प्रातः अनूप जी मिलने आये, शायद उससे कुछ प्रेरणा मिली होगी और फिर शाम को अकेले कानपुर शहर जाना पड़ा। दो घंटे की इस कष्टदायी यात्रा ने समय दिया विचार मंथन का और एक दो विचार जो मन में आये वही लिख रहा हूँ। पहली बात जिसे विचार के बजाय यदि अवलोकन कहा जाय तो अधिक उचित होगा। आज हमारे संविधान लेखन समिति के प्रमुख डॉ भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिवस था जोकि पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जा रहा है। यदि आपको राष्ट्रीय अवकाश की गुरुता सही से समझ न आ रही हो तो जान लीजिये कि आज मदिरा निषिद्ध दिन (ड्राई डे) है, अब शायद आपको इसकी गुरुता समझ आ गयी होगी। चलिये इसी बहाने आज के दिन कुछ बुराइयाँ शायद कम हों या फिर अगर कालाबाजारी को भी एक बुराई माना जाय तो बाकी कुछ बुराइयाँ ज्यादा हों। ये ड्राई डे का फ़ंडा तो मेरी आज तक समझ नहीं आया। आपकी एक सोच होती है, कोई चीज बुरी है या फिर काम चालाऊ है पर कोई चीज किसी एक दिन के लिये अस्वीकार्य होना मेरी समझ से परे है। यही हाल मंगलवार या नवरात्रों में मांसाहार परहेजियों का है। यदि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं तो कम से कम उसे मूर्ख तो नहीं समझना चाहिये। वैसे ऐसे लोगों के लिये ईश्वर का कुछ न बोलना एक वरदान सरीखा है, वह तो कभी बताता नहीं यहाँ आकर कि “वत्स तुम जो ये ढोंग करते हो क्या सोचते हो मेरी समझ नहीं आता”। बोलते हैं वे लोग जिनसे आप लोभ देकर अपनी मनपसंद और सुविधाजनक बात बुलवा सकते हैं। धर्म का उद्देश्य होना चाहिये समाज को बुराइयों से दूर रखना और शायद कभी रहा भी हो पर आज कदापि नहीं है। मेहदी हसन की गायी ग़ज़ल की एक पंक्ति याद आ रही है -
“ज़माने भर के ग़म और एक तेरा ग़म,
ये ग़म होता तो कितने ग़म न होते।”
चलिये पर आज के उत्सव सरीखे वातावरण को देख मन में एक उम्मीद जगी। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गाँधी जयन्ती जैसे राष्ट्रीय पर्व तो आजकल स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों तक ही सीमित रह गये हैं या फिर कुछ ज्यादा ही अभद्रता से बोला जाय तो मजबूरी बन गये हैं। पर आज जिस तरह से आम जनता (या फिर कुछ लोग अगर इसे ख़ास जनता कहना चाहें) इसे मना रही थी यह समाजोत्थान का एक अच्छा संकेत हो सकता है यदि इसे राजनीति से दूर रखा जाय।
कल मैं कुछ समय के लिये एक सम्मेलन में भाग लेने के लिये शिमला जा रहा हूँ। कहने की कोई आवश्यकता तो नहीं है पर फिर भी यह सम्मेलन कम और देशाटन अधिक है। लौटकर कुछ अनुभव लिखूँगा यात्रा के बारे में और अपने विचारों के बारे में। यह लेख अपने आप में किसी तरह से भी पूर्ण नहीं है अतः आप अपनी टिप्पणियों से इसे पूरा करने में मेरी सहायता कर सकते हैं।
April 15, 2008 at 2:59 am |
बिल्कुल सही,
इसीलिये हम केवल साल में दो ही दिन ड्राई नही रहते हैं, पहला जिस दिन बारिश हो, दूसरा जिस दिन बारिश न हो ।
शिमला जाओ, बढिया फ़ोटो खीचों और दिखाओ, शायद तुम्हे याद आये कि कालेज में तुम्हारी फ़ोटोग्राफ़ी के कितने मुरीद थे ।
निन्दा भले ही न करो, लेकिन बढिया संगीत जो सुनवा रहे हो उसे जारी रखो । शिमला में अगर कोई ईनाम वगैरह मिले तो उससे कोई अद्धा/पऊवा चढा लेना
चाहो तो शिमला में ही जाखू मंदिर भी हो आना । बढिया लगता है वहाँ जा के ।
और इस प्रकार हमारी फ़ुटकर सी बेतरतीब टिप्पणी समाप्त होती है ।