रचना: नासिर काज़मी
स्वर: बल्क़ीस ख़ानुम
तेरे मिलने को बेकल हो गये हैं
मगर ये लोग पागल हो गये हैं
(बेकल == व्याकुल)
बहारें लेके आये थे जहाँ तुम
वो घर सुनसान जंगल हो गये हैं
यहाँ तक बढ़ गये आलम-ए-हस्ती
कि दिल के हौसले शल हो गये हैं
(शल == थक जाना)
कहाँ तक ताब लाये नातवाँ दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गये हैं
(ताब == सहनशीलता, नातवाँ == कमजोर, मुसलसल == निरन्तर)
निगाह-ए-यास को नींद आ रही है
मुसर्दा पुरअश्क बोझल हो गये हैं
(निगाह-ए-यास == उदास आँखें, मुसर्दा == , पुरअश्क == आँसुओं से भरे)
उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गये हैं
जिन्हें हम देख कर जीते थे ‘नासिर’
वो लोग आँखों से ओझल हो गये हैं
May 8, 2008 at 7:40 am |
आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.
एक नया हिन्दी चिट्ठा भी शुरु करवायें तो मुझ पर और अनेकों पर आपका अहसान कहलायेगा. इन्तजार करता हूँ कि कौन सा शुरु करवाया. उसे एग्रीगेटर पर लाना मेरी जिम्मेदारी मान लें यदि वह सामाजिक एवं एग्रीगेटर के मापदण्ड पर खरा उतरता है.
यह वाली टिप्पणी भी एक अभियान है. इस टिप्पणी को आगे बढ़ा कर इस अभियान में शामिल हों. शुभकामनाऐं.