तुम और फ़रेब खाओ

रचना: आग़ा हश्र
स्वर: फ़रीदा ख़ानुम

तुम और फ़रेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से
तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से

बरबाद-ए-दिल का आख़िरी सरमाया थी उम्मीद
वो भी तो युम ने छीन लिया मुझ ग़रीब से

गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है
होता है पहरों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से

धुंधला चली निगाह दम-ए-वापसी है अब
आ पास आ के देख लूँ तुझको क़रीब से

पहला भाग

दूसरा भाग

One Response to “तुम और फ़रेब खाओ”

  1. समीर लाल Says:

    आभार रचना पेश करने के लिए और सुनवाने के लिए.

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    आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

    एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

    यह एक अभियान है. इस संदेश को अधिकाधिक प्रसार देकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बनें.

    शुभकामनाऐं.

    समीर लाल
    (उड़न तश्तरी)

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