रचना: आग़ा हश्र
स्वर: फ़रीदा ख़ानुम
तुम और फ़रेब खाओ बयान-ए-रक़ीब से
तुम से तो कम गिला है ज़ियादा नसीब से
बरबाद-ए-दिल का आख़िरी सरमाया थी उम्मीद
वो भी तो युम ने छीन लिया मुझ ग़रीब से
गोया तुम्हारी याद ही मेरा इलाज है
होता है पहरों ज़िक्र तुम्हारा तबीब से
धुंधला चली निगाह दम-ए-वापसी है अब
आ पास आ के देख लूँ तुझको क़रीब से
पहला भाग
दूसरा भाग
May 12, 2008 at 6:18 am |
आभार रचना पेश करने के लिए और सुनवाने के लिए.
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आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं, इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.
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शुभकामनाऐं.
समीर लाल
(उड़न तश्तरी)