नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं
May 16, 2008रचना: नासिर काज़मी
स्वर: मुन्नी बेग़म / ग़ुलाम अली
नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं
तू भी दिल से उतर न जाय कहीं
आज देखा है तुझको देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाय कहीं
आरज़ू है कि तू यहाँ आये
और फ़िर उम्र भर न जाय कहीं
दिल जलाता हूँ और सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाय कहीं
न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाय कहीं
आओ कुछ देर रो ही लें ‘नासिर’
फिर ये दरिया उतर न जाय कहीं
मुन्नी बेग़म
ग़ुलाम अली
Posted by अंकुर वर्मा