रचना: क़मर जलालवी
स्वर: मुन्नी बेग़म
यहाँ तंगी-ए-क़फ़स है वहाँ फ़िक्र-ए-आशियाना
न यहाँ मेरा ठिकाना न वहाँ मेरा ठिकाना
न फूल हैं चमन में न शाख़-ए-आशियाना
फ़क़त एक बर्क़ चमके के बदल गया ज़माना
मेरे सामने चमन का न फ़साना छेड़ हमदम
मुझे याद आ न जाये कहीं अपना आशियाना
‘क़मर’ अपने दाग़-ए-दिल की वो कहानी मैनें छेड़ी
फ़ितना किये सितारे मेरा रात भर फ़साना
June 3, 2008 at 6:43 am |
बहुत उम्दा चयन करके लाये हैं, आनन्द आ गया. आभार.
June 3, 2008 at 9:05 am |
कहरवा (एक लोकप्रिय ताल जो अक्सर लोकगीतों और फ़िल्मी नग़मों में इस्तेमाल होती है)में ग़ज़लें बहुत कम सुनने को मिलती है.मुन्नी बेग़म ने इसे कहरवा में गाकर सुनने वाले के दिल में गहरा उतार दिया है.