इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया

June 4, 2008

रचना: सुदर्शन ‘फ़ाकिर’
स्वर: बेग़म अख़्तर

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया

रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें ‘फ़ाकिर’
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने ने दिया