रचना: सुदर्शन ‘फ़ाकिर’
स्वर: बेग़म अख़्तर
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया
आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया
रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया
एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें ‘फ़ाकिर’
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने ने दिया
June 4, 2008 at 7:00 am |
आभार बेगम अख्तर की इस प्रस्तुति को यहाँ प्रस्तुत करने का.
June 4, 2008 at 8:47 am |
बहुत अच्छे.
आभार.
June 4, 2008 at 9:46 am |
बेहद खूबसूरत गजल यहाँ सुनाने के लिए शुक्रिया ..एक एक शेर इसका दिल को छूने वाला है
June 4, 2008 at 10:23 am |
wah bahut hi khubsurat
June 4, 2008 at 12:51 pm |
हमारी fav….गजलों मे से एक रही….अलबत्ता हमने जगजीत चित्रा की आवाज मे सुना ओर बाद मे अपनी दोस्तो की महफ़िल मे खूब गाया…आपने पुराने दिनों की याद दिला दी…..
March 8, 2009 at 1:04 pm |
“ishqme gairte zazabat ne rone na diya.”
nice creation of a nice person.