तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था

June 6, 2008

रचना: दाग़ दहलवी
स्वर: ग़ुलाम अली

ख़त दीजिये छुपाके मिले वो अगर कहीं
लेना न मेरे नाम को ऐ नामबर कहीं

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किसका था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किसका था

वफ़ा करेंगे निभायेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किसका था

न पूछ-पाछ थी किसी की न आव भगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किसका था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किये पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बादिल वो पयाम किसका था

इन्हीं सिफ़त से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किससे कहें
ख़याल दिल को मेरे सुबह-ओ-शाम किसका था

हर एक से कहते हैं क्या ‘दाग़’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किसका था