तुम्हें दिल्लग़ी भूल जानी पड़ेगी

स्वर: नुसरत फ़तेह अली ख़ान

तुम्हें दिल्लग़ी भूल जानी पड़ेगी, मोहब्बत की राहों में आकर तो देखो

तड़पने पे मेरे न फिर तुम हँसोगे, कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो

होठों के पास आये हँसी क्या मज़ाल है, दिल का मुआमला है कोई दिल्लग़ी नहीं

ज़ख़्म पे ज़ख़्म खा के जी अपने लहू के घूंट पी, आह न कर लबों को सी, इश्क़ है दिल्ल्ग़ी नहीं

दिल लगा कर पता चलेगा तुम्हें, आशिक़ी दिल्लगी नहीं होती

कुछ खेल नहीं है इश्क़ की लाग, पानी न समझिये आग है आग

ख़ूँ रुलायेगी ये लगी दिल की, खेल समझो न दिल्लगी दिल की

ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजै, इक आग़ का दरिया है और डूब के जाना है

वफ़ाओं की हमसे तवक्को नहीं है मगर एक बार आज़मा कर तो देखो

ज़माने को अपना बना कर तो देखा हमें भी तुम अपना बनाकर तो देखो

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2 Responses to तुम्हें दिल्लग़ी भूल जानी पड़ेगी

  1. बहुत आभार इस प्रस्तुति का. आनन्द आ गया.

  2. इसके लिये बहुत बहुत आभार।

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