इस साल पूरे उत्तर भारत और खासकर कानपुर में गर्मी ने हद ही पर कर दी थी। एक ही उपाय सुझाया इससे बचने का कि पहाड़ों में चलते हैं। नैनीताल, मसूरी और शिमला तो पहले ही घूम चुके थे और इन सभी की गर्मियों में भीड़ भाड़ के कारण बुरी हालत हो जाती है इसलिये सोचा कि थोड़ी शान्त और एकान्त जगह चलते हैं।
मेरा बचपन खटीमा (उस समय नैनीताल और अब उत्तराखण्ड के उधम सिंह नगर जनपद में स्थित) में बीता है और तभी से सपना था पिथौरागढ़ जाने का जो इस बार जाकर साकार हुआ। मैंनें और तीन सहपाठियों अनुपम, विकास और टोनी को अपने साथ चलने को तैयार किया और 20 जून की शाम को कानपुर से निकल पड़े। पिथौरागढ़ जाने के दो रास्ते हैं एक हल्द्वानी से अल्मोड़ा बागेश्वर होते हुये और दूसरा खटीमा से चम्पावत होते हुये। इतनी आसान सी बात को समझने में विकास को काफ़ी दिक्कत हुई पर अन्त में समझ आ ही गया।पहला दिन: खटीमा से पिथौरागढ़ (लगभग 160 किमी)
सुबह करीब 7 बजे हमलोग हिमालय की सैर के लिये खटीमा से रवाना हुये। राष्ट्रीय राजमार्ग 125, जो टनकपुर से तवाघाट तक जाता है, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन द्वारा संचालित होने के कारण अन्य पहाड़ी सड़कों की तुलना में काफ़ी अच्छा है। हमें केवल सूखीढाँग के पास ही करीब 5 किमी का खराब टुकड़ा मिला।
सूखीढाँग से मुख्य मार्ग से करीब 5 किमी की दूरी पर श्यामलाताल स्थित है जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई करीब 1520 मी है। यहाँ पर विवेकानन्द आश्रम के अतिरिक्त एक छोटा ताल है जो कि हमें गर्मी का मौसम होने के कारण और भी छोटी स्थिति में मिला। यहाँ पर चाय और थोड़ी देर के विश्राम के बाद हम लोग चम्पावत के लिये निकल पड़े। चम्पावत होते हुये करीब तीन घंटे में हम लोग लोहाघाट पहुँच गये। यहाँ थोड़ा रुककर हमने दोपहर का भोजन लिया और पास ही में स्थित एक चोटी एबट माउन्ट के लिये चल पड़े। सड़क का रास्ता करीब 9 किमी का है जबकि पैदल का रास्ता 4 किमी लम्बा है। एबट माउन्ट समुद्र तल से 2130 मी की ऊँचाई पर स्थित लोहाघाट के आसपास का सबसे ऊँचा स्थान है। इस चोटी की खोज ब्रिटिश इंडिया में झाँसी के जॉन हेरॉल्ड एबट ने 1914 में की थी। देवदार और ओक के पेड़ों से भरपूर इस चोटी से वृहद हिमालय की कई बर्फ़ीली चोटियों के साथ घाटी का विहंगम दृश्य मिलता है। मौसम साफ़ न होने के कारण हम लोगों को बहुत अच्छा दृश्य तो देखने को नहीं मिला परन्तु ठंडी हवाओं के बीच वहाँ के दृश्य स्थल पर बैठना अपने आप में बहुत सुखदायी था। यहाँ पर जीर्णावस्था में एक चर्च भी है जो देखने लायक है। एबट माउन्ट से करीब डेढ़ बजे हम लोग पिथौरागढ़ के लिये चल पड़े। घाट होते हुये करीब चार बजे हम लोग पिथौरागढ़ पहुँच गये। अपना सामान कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह में रखकर हमलोग यहाँ से 6 किमी दूर स्थित चोटी चण्डाक पर गये। यहाँ से पूरे पिथौरागढ़ का दृश्य देखने को मिलता है और यदि आसमान साफ हो तो हिमालय की चोटियाँ भी दिखाई देती हैं।दूसरा दिन: पिथौरागढ़ से मुनश्यारी (लगभग 120 किमी)
पिथौरागढ़ से मुनश्यारी करीब 120 किमी दूर है परन्तु संकरी सड़क और टेढ़े-मेढ़े मार्ग के कारण 6-7 घंटे लग जाते हैं। रास्ते में बहुत से ऐसे स्थान आते हैं जहाँ से पहाड़ियों, घाटियों और नदियों का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।
पिथौरागढ़ से मुनश्यारी के दो रास्ते हैं। एक देवल थल, थल, तेजाम, गिरगाँव होते हुये और दूसरा ओग्ला, अस्कोट, जौलजीबी और मडकोट होककर। पहला मार्ग करीब 30 किमी छोटा पड़ता है, जबकि यदि अस्कोट में कस्तूरी मृग संरक्षित उद्यान देखते हुये जाना हो तो दूसरा मार्ग उचित है। हमने प्रथम मार्ग चुना क्योंकि अस्कोट कम ऊँचाई पर होने के कारण गर्मियों में गर्म हो जाता है और ऐसे में जानवर भी ठंडी जगहों में छुपे रहते हैं। देवलथल के आहे से थल तक करीब 7-8 किमी का रास्ता रामगंगा नदी के किनारे किनारे जाता है और दो पहाड़ियों के मध्य पथरीले रास्ते से बहता नदी का निर्मल जल देखते ही बनता है। यहाँ पर कुछ देर के लिये हमलोग रुककर नदी के पानी तक भी गये। थल के आगे फिर से चढ़ाई शुरु हो जाती है और तेजाम आने के बाद सामने पहाड़ी पर बहुत दूर और ऊपर कुछ झरने सा दिखाई देता है। अगले करीब आधे घंटे तक हम लोग इसी बात पर बहस करते रहे कि यह बिर्थी झरना है या नहीं और अगर है तो वहाँ तक पहुँचना संभव है नहीं। आखिरकार ये बिर्थी झरना ही निकला और दो ऊँची पहाड़ियों को जोड़ने वाले दो पुलों की सहायता से हम लोग बिर्थी झरने के निकट पहुँच गये। सड़क से झरने तक जाने के लिये करीब 300 मीटर की खड़ी चढ़ाई थी झरने को पास से देखने की उत्सुकता में हाँफते हुये झरने के पास पहुँचे तो उसमें नहाये बिना रहा न गया। वहाँ मौजूद कुछ अन्य लोगों ने हमारी सहायता की और बताया कि कौन कौन से पत्थर फिसलन युक्त हैं और उन पर कैसे सावधानी पूर्वक चला जाय। ठंडे पानी ने सारी थकान मिटा दी। नहाने के बाद पानी में हमें कुछ जोंक, मेढक और एक साँप के दर्शन हुये, जो अगर पहले दिख जाता तो शायद नहाने की जुर्रत नहीं करते। हममें से एक को करीब 3 फुट लम्बी गोह भी दिखी वहाँ पर। उसके बाद हमलोग गिरगाँव, रातापानी होते हुये मुनश्यारी पहुँच गये। यहाँ भी हमने कुमाऊँ मण्डल विकास निगम का पर्यटक आवास गृह ही रुकने के लिये चुना। शाम को हम लोग पास में ही स्थित नंदा देवी मंदिर गये यह मुनश्यारी के एक ओर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है और यहाँ से जोहर घाटी और उसके पार हिमालय की गगन चुम्बी चोटियाँ दिखाई देती हैं, जिसमें सबसे प्रमुख पंचचुली है। परन्तु मौसम ने यहाँ भी हमें निराश किया और हमें घाटी और हिमालय की प्रथम श्रेणी को देखकर ही संतुष्ट होना पड़ा।तीसरा दिन: मुनश्यारी में
तीसरा दिन यात्रा का सबसे रोचक दिन था। इसके कई कारण थे; पहला तो हमने इस दिन कहीं की भी यात्रा नहीं की पूरा दिन मुनश्यारी के आस पास की जगहों पर ही जा कर बिताया, दूसरा इस दिन हमलोग करीब 12 किमी पैदल चले वो भी पहाड़ी रास्तों पे, तीसरा और सबसे मुख्य इस दिन हमें पहाड़ी महिलाओं के अग्रणी और उदारवादी होने का जीवंत उदाहरण मिला
(आगे पढ़िये)।
अगले भाग में शेष तीन दिनों का लेखा जोखा …












विवरण पढकर तो मन प्रसन्न हो गया तो कैमरा वाकई में चांपू है।
बढिया चित्र…आगे के प्रसंग भी फ़टाफ़ट लिख डालो।
मन को मोहनेवाले सुंदर चित्र .. बढिया यात्रा वृतांत .. पढना सुखद रहा ।
hahahaha… !@#$%^…
बहुत ही सुन्दर यात्रा-वृतांत लिखा ! पढ़ते हुए लग रहा था की दोबारा कुमाऊं की ऊँची पहाडियों और सुन्दर जंगलो में सफ़र कर रहा हूँ ! वाकई १० दिन बहुत अच्छे थे ! कुछ मीठी नोकझोक कुछ झगडा और कुछ छेडछाड़…याद रहेंगे ये १० दिन हिमालय की गोद में…
ये तो मेरे कैमरे की ही फोटो हैं जो तुमने दिलवाया था (Nikon S230)। चापू वाला कैमरा तो अनुपम का है और उसकी फोटो उसके पिकासा एल्बम में हैं जो तुमने कुछ दिनों पहले देखा होगा। कॉपीराइट इश्यू की वजह से यहाँ वो फोटो नहीं लगाईं।
aapka khatima padharne ke liye bahut bahut dhanyabad………………