उत्तर भारत में जैसे-जैसे भीषण गर्मी का प्रकोप फैलता है, वैसे-वैसे लोग राहत पाने के लिये हिमालय पर स्थित अनेकों रमणीक स्थलों का रुख करते हैं। और देखते ही देखते सुगम्य स्थानों पर पर्यटकों की बाढ़ आ जाती है। ऐसे में यदि आप प्रकृति की सुन्दरता का वास्तव में आनन्द उठाना चाहते हैं तो कुछ अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध और दुर्गम स्थान पर जाने में ही बुद्धिमत्ता है। ऐसा नहीं कि वहाँ पर भीड़ नहीं होगी, हाँ पर कम होगी और भारत की जनसंख्या देखते हुये इससे अधिक की अपेक्षा करना भी ठीक नहीं। इन्हीं स्थानों में से एक है उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ धाम के निकट स्थित फूलों की घाटी। हम लोग पिछले वर्ष सितम्बर माह में यहाँ गये थे, और तभी से ही मैने यह पोस्ट भी लिखना शुरु की थी। पर एक सरकारी परियोजना की भाँति इस पर काम काफी धीमी गति से हुआ, और इसके लिये मैने समय समय पर कई बहाने बनाये। फिर सोचा कि भला कौन हमारी पोस्ट पढ़ने के लिये मरा जा रहा है। आराम से अगला सीजन शुरु होने तक लिखेंगे, और अब जब यह शुरु होने ही वाला है इसलिये आज इसे पूरी कर रहा हूँ। इस पंक्ति के बाद पोस्ट में डिस्कान्टन्यूइटी है, कृपया इस पर ध्यान न देते हुये आगे पढ़ें।
उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) है। इसके निकट ही स्थित हेमकुण्ड एक पहाड़ी हिम कुण्ड है जिसके तट पर एक गुरुद्वारा और एक लक्षमण मन्दिर निर्मित हैं। यहाँ जाने के लिये ॠषिकेश – बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ के थोड़ा आगे गोविन्दघाट तक वाहन का और उसके बाद पैदल मार्ग है। इन दोनों स्थान पर जाने का हमारा प्लान बहुत समय से था। इसी बीच हमारे मित्र नीरज और उनके अमेरिकी मित्र टॉड का भारत आना हुआ और हम सबने इस यात्रा पर जाने का निर्णय लिया।
फूलों की घाटी और हेमकुण्ड की यात्रा साल में चार महीनों (जून से सितम्बर) के लिये खुली रहती है। इस यात्रा में समुद्र तल से 1830 मी से 4330 मी तक की कुल 55 किमी की दूरी पैदल या खच्चर पर तय करनी होती है। अतः इसके लिये शारीरिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है। यह यात्रा ॠषिकेश से प्रारम्भ होती है (क्योंकि हमारा घर ॠषिकेश में है
) और यात्रा के कई साधन हैं। यदि यात्रा में किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक असुविधा जैसे यातायात के साधन, विश्रामगृह आदि की अनुपलब्धता से बचना चाहते हैं तो गढ़वाल मंडल विकास निगम का पैकेज टूर कर सकते हैं। इसमें प्रति व्यक्ति करीब 8000 रुपये का खर्चा आता है, जबकि सामान्य बस/टैक्सी आदि से यात्रा करके इसे 4000 रुपये से कम में निपटाया जा सकता है। हमने दूसरा यानी सस्ता और एडवेंचरस रास्ता चुना।
पहला दिन: ॠषिकेश से जोशीमठ (250 किमी सड़क मार्ग )
ॠषिकेश से जोशीमठ की करीब 250 किमी की दूरी तय करने में 8 से 10 घंटे लग जाते हैं। जाने के लिये उपलब्ध साधनों में उत्तराखण्ड परिवहन की बसें (एक हरिद्वार से और एक देहरादून से), गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन (GMOU) की बसें और टैक्सी/जीप मुख्य हैं। बस का किराया 230 – 250 रुपये जबकि जीप का किराया करीब 300 रु है। मार्ग में देवप्रयाग (भागीरथी और अलकनन्दा का संगम), श्रीनगर (पुराने गढ़वाल राज्य की राजधानी), रुद्रप्रयाग (अलकनन्दा और मंदाकिनी का संगम), कर्णप्रयाग (अलकनन्दा और पिण्डर का संगम) और चमोली आदि प्रमुख नगर पड़ते हैं। जोशीमठ और मार्ग के अन्य सभी प्रमुख नगरों में ठहरने के दो सर्वोत्तम स्थान गढ़वाल मंडल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह और बद्रीनाथ – केदारनाथ मन्दिर समिति के विश्रामगृह हैं। रात्रि विश्राम के लिये जोशीमठ ही सबसे उचित स्थान है, वैसे यदि आप यहाँ से 18 किमी और आगे गोविन्दघाट तक पहुँच सकें तो और अच्छा है।
दूसरा दिन: जोशीमठ से घाँघरिया (18 किमी सड़क मार्ग और 13 किमी पैदल मार्ग )
जोशीमठ से गोविन्दघाट का मार्ग प्रातः 6 बजे खुलता है। जोशीमठ से जितना शीघ्र निकलें उतना अच्छा है। जोशीमठ से गोविन्दघाट की 18 किमी की यात्रा में 30 से 45 मिनट का समय लगता है। गोविन्दघाट में बद्रीनाथ से आने वाली निर्मल अलकनन्दा नदी के तट पर एक काफी बड़ा गुरुद्वारा निर्मित है जिसका मुख्य उद्देश्य हेमकुण्ड जाने वाले यात्रियों को विश्रामस्थल उपलब्ध कराना है। यहाँ से पैदल मार्ग प्रारम्भ होता है, अतः यदि आप के पास कुछ भी अतिरिक्त सामान है जिसके बिना आपका काम चल सकता है तो उसे आप यहाँ गुरुद्वारे में उपलब्ध लॉकर में रख सकते हैं। सिखों का प्रसिद्ध तीर्थ होने के नाते यहाँ भी हमें भीड़ में तो कोई खास कमी नहीं मिली परन्तु इसी कारण से सुविधायें जैसे खाने-पीने का सामान, पानी इत्यादि मार्ग भर उपलब्ध रहीं। जोशीमठ से घाँघरिया तक का 13 किमी का रास्ता तय करने में शारीरिक क्षमता के अनुसार 5 से 8 घंटे लग जाते हैं। रास्ता पूरे समय पुष्पावती नदी के साथ साथ चलता है जो फूलों की घाटी से निकलकर गोविन्दघाट के पास अलकनन्दा में मिलती है। मार्ग भर इस नदी की गर्जना और दूध जैसा पानी देखा जा सकता है। रास्ते में दो गाँव पड़ते है पहला गाँव पुलना करीब 3 किमी के बाद और दूसरा गाँव भ्यूंडार करीब 8 किमी बाद। भ्यूंडार इस मार्ग पर स्थित अन्तिम वर्ष पर्यन्त आबादी है, इसके आगे केवल गर्मियों में पर्यटकों की सुविधा और उससे जुड़े रोजगार के लिये ही लोग आते हैं। मार्ग के अन्तिम 3 किमी कुछ ज्यादा ही मुश्किल हैं परन्तु धीरे धीरे निकल ही जाते हैं। घाँघरिया में रात्रि विश्राम हेतु गढ़वाल मंडल विकास निगम का एक पर्यटक आवास गृह और अन्य बहुत से छोटे छोटे होटल हैं। इसके अलावा एक गुरुद्वारा (गोविन्दधाम) भी है जहाँ काफी लोगों के रुकने की व्यवस्था है। यह दिन कुल मिला के शायद यात्रा का सबसे मुश्किल दिन था।
तीसरा दिन: घाँघरिया से फूलों की घाटी और वापस (14 किमी पैदल मार्ग )
घाँघरिया से करीब 1 किमी आगे जाकर फूलों की घाटी और हेमकुण्ड का मार्ग विभक्त हो जाता है। यहाँ से आगे संरक्षित क्षेत्र होने के नाते खच्चरों का प्रवेश वर्जित है। फूलों की घाटी करीब 3 किमी आगे से प्रारम्भ होती है और आगे 7-8 किमी तक विस्तृत है। घाँघरिया से निकलते ही आप मार्ग में झाड़ियों में लगे अनेकों प्रकार के छोटे छोटे फूल देख सकते हैं। फूलों की घाटी में बहार काफी अल्पकालिक होती है। वर्ष में करीब 4 माह (दिसम्बर से मार्च) पूरी घाटी हिमाच्छादित रहती है। अप्रैल में बर्फ पिघलने के साथ ही हरियाली वापस आती है और घाटी में फूलों की सैकड़ों प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। एक समय पर सभी फूल नहीं खिलते अतः यदि आप सभी प्रकार के फूलों को देखना चाहते हैं तो कम से कम तीन बार आना पड़ेगा। यहाँ आने के लिये सम्भव हर माह की विशिष्टता को यदि लें तो उसका सारांश इस प्रकार है: जून – मार्ग में न्यूनतम गन्दगी, जुलाई और अगस्त – सर्वाधिक हरियाली परन्तु बारिश, सितम्बर – कुछ दुर्लभ पुष्प जैसे ब्रह्मकमल और मौसम साफ होने के नाते हिमालय की कुछ दूरस्थ चोटियों के दर्शन। कुल मिला कर हर समय यहाँ देखने के लिये कुछ न कुछ विशिष्ट होता है। हमें यहाँ पर एक इजराइल से आये एक वनस्पति विज्ञानवेत्ता मिले जिन्होंने मार्ग में पड़ने वाले फूलों और पेड़ों की कई प्रजातियों से हमें अवगत कराया। हम लोग घाटी में करीब 4 किमी तक गये और शाम तक घाँघरिया वापस आ गये।
चौथा दिन: घाँघरिया से हेमकुण्ड और वापस (12 किमी पैदल मार्ग )
घाँघरिया से हेमकुण्ड का 6 किमी का मार्ग काफी कठिन है जिसमें करीब 1300 मी की ऊँचाई तय करनी होती है। समुद्र तल से 3000 मी की ऊँचाई से अधिक पर ऑक्सीजन की कमी को महसूस किया जा सकता है। ऐसे में एल्टीट्यूड सिकनेस से बचने के लिये शरीर में पानी की मात्रा अधिक रखनी चाहिये। हेमकुण्ड का मार्ग एक खड़ी पहाड़ी पर चढ़ता है और लगभग पूरे रास्ते से घाँघरिया गाँव को छोटा होता देख सकते हैं। हेमकुण्ड एक पर्वतीय झील है जो उसके तीन ओर स्थित 7 हिमनदों के पिघलने से बनती है। वर्ष में 8 माह यह जमी रहती है और सिर्फ जुलाई से अक्टूबर तक 4 महीनों के लिये पिघलती है। इस झील के तट पर एक गुरुद्वारा और एक लक्षमण मन्दिर बने हुये हैं। जील से एक छोटी नदी लक्षमण गंगा निकलती है जो घाँघरिया में पुष्पावती नदी में मिल जाती है।
पाँचवाँ दिन: घाँघरिया से चमोली (13 किमी पैदल मार्ग और 70 किमी सड़क मार्ग )
घाँघरिया से गोविन्दघाट तक उतरने के सफर काफी आसानी से हो जाता है क्योंकि जैसे जैसे आप नीचे आते हैं ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ने के साथ ही शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। हम लोग करीब 4 घंटे में नीचे उतर आये। उसी दिन हम लोगों ने अगले दिन की यात्रा के मार्ग को कम करने के लिये शाम होने तक चमोली तक का सफर तय कर लिया। यदि घाँघरिया थोड़ा और जल्दी चला जाय तो शाम तक रुद्रप्रयाग पहुँचा जा सकता है, जिससे अगले दिन का सफर और कम हो सकता है।
छठा दिन: चमोली से ॠषिकेश (200 किमी सड़क मार्ग )
चमोली से ॠषिकेश पहुचने में करीब 6 घंटे लगे और दोपहर तक हम लोग घर पहुँच गये। एक तरफ तो 6 दिनों की थकान थी, पर दूसरी ओर प्रकृति की उस छटा का अनुभव जिसे अभी भी इन्सान बरबाद नहीं कर पाया है।
इस पूरी पोस्ट में मैने यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता का कोई खास बखान नहीं किया है क्योंकि शब्दों में यह बताना असम्भव है। कुछ हद तक इसे आप इस फोटो एलबम में देख सकते हैं।
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| फूलों की घाटी और हेमकुण्ड यात्रा |


adabhut hai ye sab
अंकुर वर्मा जी आप का यात्रा वर्णन तथा लिखने की शैली अच्छी है । जानकारी के लिए धन्यवाद!
I wnt to go to valley of flowers
this is nice write. and nice pic.