दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

मई 13, 2008

रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: मेंहदी हसन / बेग़म अख़्तर / नूरजहाँ

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दिगार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वल-वले दैल-ए-ना-कर्दाकार के

मेंहदी हसन

बेग़म अख़्तर

नूरजहाँ


मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए

मार्च 30, 2008

रचना: मिर्ज़ा असदल्लाह ख़ाँ ‘ग़ालिब’

मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए
जोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किये हुए
(क़दह == प्याला)

करता हूँ जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
अरसा हुआ है दावत-ए-मिज़्श्गाँ किये हुए
(लख़्त == टुकड़ा, मिज़्श्गाँ == पलक)

फिर वज़ा-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबाँ किये हुए
(वज़ा == स्वभाव, चाक == फटा हुआ, गिरेबाँ == कॉलर)

फिर गर्मनाला हाये शररबार है नफ़स
मुद्दत हुई है सैर-ए-चराग़ाँ किये हुए
(शररबार == बरसते हुये शोले, नफ़स == साँस)

फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
सामाँ-ए-सदहज़ार नमकदाँ किये हुए
(पुर्सिश == पूछ्ताछ, सद == सौ, नमकदाँ == नमक का बर्तन)

फिर भर रहा हूँ ख़ामा-ए-मिज़्श्गाँ बाख़ून-ए-दिल
साज़-ए-चमनतराज़ी-ए-दामाँ किये हुए
(ख़ामा == कलम, साज़ == चाह, तराज़ी == अनुमति देना)

बाहमदिगर हुए हैं दिल-ओ-दीदा फिर रक़ीब
नज़्ज़ारा-ओ-ख़याल का सामाँ किये हुए
(हमदिगर == आपस का, सामाँ == सामना करना)

दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाये है
पिंदार का सनमकदा वीराँ किये हुए
(तवाफ़ == जाल, घेराव, मलामत == दोष, पिंदार == गर्व/ अहंकार, सनमकदा == मन्दिर)

फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
अर्ज़-ए-मता-ए-अक़्ल-ओ-दिल-ओ-जाँ किये जुए
(तलब == ढूँढ़ना, मता == कीमती सामान)

दौड़े है फिर हर एक गुल-ओ-लाला पर ख़याल
सदगुलसिताँ निगाह का सामाँ किये हुए

फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना
जाँ नज़र-ए-दिलफ़रेबी-ए-उन्वाँ किये हुए
(नामा-ए-दिलदार== प्रेमपत्र, उन्वाँ == उपाधि)

माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख पे परेशाँ किये हुए
(लब-ए-बाम == छत का किनारा, सियाह == काली)

चाहे फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ू
सुर्मे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़्श्गाँ किये हुए
(मुक़ाबिल == बदले में, दश्ना == छुरा)

इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
चेहरा फ़ुरोग़-ए-मै से गुलिस्ताँ किये हुए
(नौबहार-ए-नाज़ == प्रियतम, फ़ुरोग़ == प्रकाश/चमक)

फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें
सर ज़ेर बार-ए-मिन्नत-दरबाँ किये हुए
(सर ज़ेर बार == सिर झुकाकर)

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए
(तसव्वुर == ख़याल)

‘ग़ालिब’ हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किये हुए
(तहय्या == निश्चय)

इक़बाल बानो

मोहम्मद रफ़ी

नूरजहाँ


मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

फ़रवरी 24, 2008

रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: नूरजहाँ

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है (2)
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
(दरख़्शाँ == रोशन, हयात == ज़िन्दगी, ग़म-ए-दहर == दुनिया भर के ग़म, आलम == दुनिया, सबात == स्थिरता, निगूँ == झुकना, फ़क़त == सिर्फ, वस्ल == मुलाकात)

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुये कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुये ख़ून में नहलाये हुये
जिस्म निकले हुये अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुये नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
(तारीक == अंधेरा, बहीमाना == डरावना, तलिस्म == जादू, अतलस == साटन का कपड़ा, कमख़्वाब == जरीदार वस्त्र, जा-ब-जा == जगह-जगह, अमराज़ == घाव, तन्नूर == भट्ठी)

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग

यू-ट्यूब वीडियो:


मेरा लौंग गवाचा

फ़रवरी 14, 2008

रचना: पंजाबी लोकगीत
स्वर: मुसर्रत नाज़िर / नूरजहाँ

आभारोक्ति : पंजाबी भाषा के मेरे अतिसीमित ज्ञान के कारण मैंने इस गीत को लिपिबद्ध करने में अपने मित्र डा. अमित जिन्दल की सहायता ली है। उनके इस प्रयास का मैं तह-ए-दिल से शुक्रगुजार हूँ।  

पीछे पीछे औंदा मेरी चाल वेन्दा आयीं  – 2
चीरे वालेया वेखदा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा
निगा मारदा आयीं  वे मेरा लौंग गवाचा

हो…ओ…ओ… आ…आ…आ…
दिल देया भैड़ैया क्यो मारना ऐ ताने वे
मिलन मैं आयी तैनु रोटी दे बहाने वे, रोटी दे बहाने वे
मिलने तां मिल नि तां रूस जांगी सदा लई
मिन्न्ताँ तू करके मनायी वे मेरा लौंग गवाचा
निगा मार दा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा

पीछे पीछे औंदा मेरी चाल वेन्दा आयीं  – 2
चीरे वालेया वेखदा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा
निगा मारदा आयीं  वे मेरा लौंग गवाचा

हो…ओ…ओ… आ…आ…आ…
काहली काहली आई सी मैं टाहलियाँ दे हेठ दी
क्ढेया सी कुंढ मैं आवाज़ सुन जेठ दी
मैनू शक पैंदा मेरे नक्क चों बुढ़क के
डिग पेया हुन डूँगी थायीं  वे  मेरा लौंग गवाचा
निगा मारदा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा

पीछे पीछे औंदा मेरी चाल वेन्दा आयीं  – 2
चीरे वालेया वेखदा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा
निगा मारदा आयीं  वे मेरा लौंग गवाचा

हो…ओ…ओ… आ…आ…आ…
मारदा सी जदो मेरा लौंग लश्कारा वे
पिट पिट तकदा सी ओनू जग सारा वे, ओनू जग सारा वे
इक उत्ते नही मैंनु सारेआँ ते शक़ वे
सब नुकराँ ते झात्ति पायीं वे मेरा लौंग गवाचा

पीछे पीछे औंदा मेरी चाल वेन्दा आयीं  – 2
चीरे वालेया वेखदा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा
निगा मारदा आयीं वे मेरा लौंग गवाचा

यू-ट्यूब पर वीडियो:
मुसर्रत नाज़िर की आवाज़ में

नूरजहाँ की आवाज़ में


कभी कहा न किसी से

फ़रवरी 6, 2008

शायर: क़मर जलाबादी
स्वर: ग़ुलाम अली/ नूरजहाँ

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे ख़बर हो गई जमाने को

चमन में बर्क़ नहीं छोड़ती किसी सूरत
तरह तरह से बनाता हूँ आशियाने को
(बर्क़ == बिजली)

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा लूँ ग़रीबख़ाने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले
कहीं जगह न मिली मेरे आशियाने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

चमन में जाना तो सय्याद देख कर जाना
अकेला छोड़ के आया हूँ आशियाने को
(सय्याद == शिकारी)

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

मेरी लहद पे पतंगों का ख़ून होता है
हुज़ूर शम्मा न लाया करें जलाने को
(लहद == कब्र)

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

दबा के क़ब्र में सब चल दिये दुआ न सलाम
ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

अब आगे इस में तुम्हारा भी नाम आयेगा
जो हुक्म हो तो यहीं छोड़ दूँ फ़साने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

‘क़मर’ ज़रा भी नहीं तुमको ख़ौफ़-ए-रुसवाई
चले हो चाँदनी शब में उन्हें मनाने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे ख़बर हो गई जमाने को

यू-ट्यूब वीडियो:

ग़ुलाम अली की आवाज़ में

नूरजहाँ की आवाज़ में


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