आत्महत्या: दोषी कौन?
July 10, 2008एक अरसे से सोच रहा था इस विषय पर लिखने की पर आज अनूप जी के लेख ने उत्प्रेरक का कार्य किया। जब भी हम किसी आत्महत्या की ख़बर सुनते हैं तो सबसे पहले दिवंगत को दोषी ठहरा देते हैं। बेवकूफ़ था, जीवन में एक चीज नहीं मिली तो क्या हुआ जिन्दग़ी इतने पर ख़त्म थोड़े ही हो जाती है। पर शायद इससे कुछ अधिक गहराई चाहिये होती है उस व्यक्ति की मानसिकता समझने के लिये। कुछ समय पहले डेविड ह्यूम की कृति “ऑन सुइसाइड” पढ़ी, लेखक के अनुसार
पिछले 10 वर्षों में दुर्भाग्यवश 7 या 8 ऐसी दुःखद घटनायें मेरे इर्द गिर्द घटित हुयीं। इनमें से कुछ लोगों से मेरा परिचय था और किसी के लिये भी मैं कम से कम उसी को एक मात्र दोषी नहीं मान सकता। कहीं माँ बाप की अतिशय आकांक्षाएं तो कहीं व्यक्तिगत उम्मीदों पर स्वयं या किसी और का ख़रा न उतरना। पर ऐसा नहीं है कि आज से 20 साल पहले ये समस्याएँ नहीं थीं या फिर आत्महत्याएँ नहीं होती थीं। हाँ आज की पीढ़ी की सहनशक्ति अवश्य ही कम हुयी है। कारण एक नहीं कई हो सकते हैं। पहला तो सूचना संचार के इस युग में आप को ये तो पता होता है कि देश दुनिया में क्या हो रहा है पर अपना पड़ोसी किस हाल में है ये नहीं। यहाँ तक कि घर वालों के पास भी समय नहीं बचा है एक दूसरे का सुख दुःख बाँटने का। अपना ही उदाहरण देता हूँ बी टेक के समय हॉस्टल में इन्टरनेट नहीं था तो दिन भर में कैंटीन, मेस, बालकनी पर कम से कम 40-50 लोगों से मिलना होता था और लगभग सभी सहपाठियों की ख़बर रहती थी। पर आजकल मित्र मंडली 5-7 तक सीमित हो गयी है। पिछ्ले महीने एक दिन शाम को बत्ती गुल हुयी तो पता चला कि छात्रावास में आजकल कौन रह रहा है, कई लोगों से तो महीनों बाद मुलाकात हुयी। इन सभी तथ्यों को पिछले 20 सालों में आये सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है। यदि हमने इससे आर्थिक संपन्नता का भोग किया है तो इसके दुश्परिणामों को भी हमें ही झेलना होगा। अभिभावकों को समझना पड़ेगा कि उनका पुत्र या पुत्री सिर्फ़ उनका सोसल स्टेटस सिंबल मात्र नहीं है। मुश्किल परिस्थितियों में हम परिवार जनों और मित्रों का सहारा लेते हैं और इन दोनों की ही अनुपलब्धता में तीसरे विकल्प के चयन में लोगो को अधिक समय नहीं लगता।
पिछ्ले दिनों मैं कानपुर के एक मनोचिकित्सक से इस विषय में बात कर रहा था उनके अनुसार एक बार जब ऐसी घटनाएं शुरू होती हैं तो जैसे चेन रिएक्शन शुरु हो जाती है क्योंकि लोगों को अपनी समस्याओं का एक सम्भावित हल आत्महत्या में दिखने लगता है। कोई कुछ ख़ास कर नहीं सकता इसे रोकने के लिये। इस तरह की घटनायें स्वयं ही कुछ वर्षों में मंद पड़ जाती हैं। अब यदि कोई कुछ नहीं कर सकता इस बारे में तो फिर इस विषय पर लिखने का भी कोई औचित्य नहीं है। यद्यपि मैं मनोचिकित्सक महोदय से पूर्णतया सहमत नहीं हूँ क्योंकि भले ही इस समस्या को सीधे किसी को परामर्श देकर नहीं सुलझाया जा सकता पर यदि इसके मूल तक पहुँचा जा सके तो अवश्य की कुछ सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।
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यह लेख मैंने आई आई टी कानपुर में हुयी दुर्घटनाओं के परिदृश्य में लिखा है। हो सकता है कि अन्यत्र परिस्थितियाँ भिन्न हों।
Posted by अंकुर वर्मा