March 28, 2008
स्वर: गुल बहार बानो
चाहत में क्या दुनियादारी, इश्क़ में कैसी मजबूरी
लोगों का क्या समझाने दो, उनकी अपनी मजबूरी
मैनें दिल की बात रखी और तूने दुनियावालों की
मेरी अर्ज़ भी मजबूरी थी उनका हुक़्म भी मजबूरी
रोक सको तो पहली बारिश की बूँदों को तुम रोको
कच्ची मिट्टी तो महकेगी है मिट्टी की मजबूरी
जब तक हँसता गाता मौसम अपना है सब अपने हैं
वक़्त पड़े तो याद आ जाती है मस्नूई मजबूरी
मुद्दत गुज़री इक वादे पर आज भी क़ायम है ‘मुहसिन’
हमने सारी उम्र निबाही, अपनी पहली मजबूरी
4 Comments |
कला और संगीत, गुल बहार बानो |
Permalink
Posted by अंकुर वर्मा
March 27, 2008
स्वर: गुल बहार बानो
हमें जहाँ में कोई साहिब-ए-नज़र न मिला
जो दिल की आँख से देखे वो दिल गवर न मिला
(दिल गवर == दिलवाला)
मता-ए-ज़िस्त में शामिल रहे हज़ार रफ़ीक़
वो जिसकी चाह थी दिल को वही मगर न मिला
(मता-ए-ज़िस्त == ?, रफ़ीक़ == दोस्त)
मुसाफ़िरों की थकावट कुछ इसलिये भी थी
सफ़र में धूप मिली साया-ए-जज़र न मिला
(साया-ए-जज़र == तनिक सी छाँव)
तलाश करते रहे हम कहाँ कहाँ लेकिन
सुकून-ए-कर्ब-नज़र हमको हमनज़र न मिला
(कर्ब-नज़र == व्यथित आँखें)
हमें जहाँ में कोई साहिब-ए-नज़र न मिला
Leave a Comment » |
कला और संगीत, गुल बहार बानो |
Permalink
Posted by अंकुर वर्मा