बाबा बुल्ले शाह

July 17, 2008

बुल्ला की जाणा मैं कौन (वडाली बन्धु)

घूँघट चक लै सजना (नुसरत फ़तेह अली ख़ान)

घूँघट चक लै सजना (वडाली बन्धु)

तेरे इश्क़ नचाया (आबिदा परवीन)


तुम्हें दिल्लग़ी भूल जानी पड़ेगी

June 25, 2008

स्वर: नुसरत फ़तेह अली ख़ान

तुम्हें दिल्लग़ी भूल जानी पड़ेगी, मोहब्बत की राहों में आकर तो देखो

तड़पने पे मेरे न फिर तुम हँसोगे, कभी दिल किसी से लगा कर तो देखो

होठों के पास आये हँसी क्या मज़ाल है, दिल का मुआमला है कोई दिल्लग़ी नहीं

ज़ख़्म पे ज़ख़्म खा के जी अपने लहू के घूंट पी, आह न कर लबों को सी, इश्क़ है दिल्ल्ग़ी नहीं

दिल लगा कर पता चलेगा तुम्हें, आशिक़ी दिल्लगी नहीं होती

कुछ खेल नहीं है इश्क़ की लाग, पानी न समझिये आग है आग

ख़ूँ रुलायेगी ये लगी दिल की, खेल समझो न दिल्लगी दिल की

ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजै, इक आग़ का दरिया है और डूब के जाना है

वफ़ाओं की हमसे तवक्को नहीं है मगर एक बार आज़मा कर तो देखो

ज़माने को अपना बना कर तो देखा हमें भी तुम अपना बनाकर तो देखो


साँसों की माला पे सिमरूँ मैं पी का नाम

May 22, 2008
स्वर: नुसरत फ़तेह अली ख़ान

आ पिया इन नैनन में जो पलक ढाँक तोहे लूँ, न मैं देखूँ गैर को न तोहे देखन दूँ

हाथ छुड़ावत जात हो जो निर्मिन जान के मोहे, हिरदय मे से जाओ तो तब मैं जानू तोहे

नील गगन से भी परे सैंया जी का गाँव, दर्शन जल की कामना पत रखियो हे राम

ना जाने किस भेस में साँवरिया मिल जाय, झुक झुक कर संसार में सबको सलाम

अब किस्मत के हाथ है इस बन्धन की लाज, मैने तो मन लिख दिया साँवरिया के नाम

वो चातर है कामनी वो है सुन्दर नार, जिस पगली ने कर लिया साजन का मन राम

जब से राधा श्याम के नैन हुये हैं चार, श्याम बने हैं राधिका राधा बन गयी श्याम

साँसों की माला पे… सिमरूँ मैं पी का नाम

अपने मन की न जानूँ और पी के मन की राम

यही मेरी बंदगी है यही मेरी पूजा, साँसों की माला पे…

इक का साजन मन्दिर में, इक का प्रीतम मस्जिद में, पर मैं साँसों की माला पे…

हम और नहीं कछु काम के मतवारे पी के नाम के, साँसों की माला पे…

प्रेम के रंग में ऐसी डूबी बन गया एक ही रूप,
प्रेम की माला जपते जपते आप बनी मैं श्याम, साँसों की माला पे…

प्रीतम का कुछ दोष नहीं है वो तो है निर्दोष
अपने आप से बातें करके हो गयी मैं बदनाम, साँसों की माला पे…

जीवन का सिंगार है प्रीतम माँग का है सिंदूर
प्रीतम की नजरों से गिरकर जीना है किस काम, साँसों की माला पे…

पहला भाग

दूसरा भाग


मस्त नज़रों से अल्लाह बचाये

May 19, 2008
स्वर: नुसरत फ़तेह अली ख़ान

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं, हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है, उनकी आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
आग को खेल पतंगों ने समझ रखा है, सब को अंजाम का डर हो ये ज़रूरी तो नहीं
शेख़ करता है जो मस्जिद में ख़ुदा को सजदे, उसके सजदों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं
सबकी साक़ी पे नज़र हो ये ज़रूरी है मगर, सब पे साक़ी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं

कोई दिल में लिये अरमान चला जाता है, कोई खोये हुये औसान चला जाता है
हुस्न वालों से ये कह दो के न निकलें बाहर, देखने वालों का ईमान चला जाता है

मस्त नज़रों से अल्लाह बचाये, माहजमालों से अल्लाह बचाये
हर बला सिर पे आ जाये लेकिन, हुस्न वालों से अल्लाह बचाये

इनकी मासूमियत पर न जाना, इनके धोके में हरगिज़ न आना
लूट लेते हैं ये मुस्कुराकर इनकी चालों से अल्लाह बचाये

भोली सूरत है बातें है भोली, मुँह में कुछ है मगर दिल में कुछ है
लाख चेहरा सही चाँद जैसा, दिल के तालों से अल्लाह बचाये

दिल में है ख़्वाहिश-ए-हूर-ओ-जन्नत, और ज़ाहिर में शौक-ए-इबादत
बस हमें शेख जी आप जैसे, अल्लाह वालों से अल्लाह बचाये


ग़म है या ख़ुशी है तू

March 26, 2008

रचना: नासिर काज़मी
स्वर: नुसरत फ़तेह अली ख़ान

ग़म है या ख़ुशी है तू, मेरी ज़िन्दगी है तू

आफ़तों के दौर में, चैन की घड़ी है तू

मेरी रात का चिराग़, मेरी नींद भी है तू

मैं ख़िज़ाँ की शाम हूँ, रुत बहार की है तू

दोस्तों के दर्मियान, वजह-ए-दोस्ती है तू

मेरी सारी उम्र में, एक ही कमी है तू

मैं तो वो नहीं रहा, हाँ मगर वोही है तू

‘नासिर’ इस दयार में, कितना अजनबी है तू

राहत फ़तेह अली ख़ान