अब तो यही हैं दिल से दुआएँ

June 5, 2008

रचना: तस्कीन क़ुरेशी
स्वर: बेग़म अख़्तर

अब तो यही हैं दिल से दुआएँ, भूलने वाले भूल ही जाएँ

वजह-ए-सितम कुछ हो तो बताएँ, एक मोहब्बत लाख ख़ताएँ

दर्द-ए-मोहब्बत दिल में छुपाया, आँख के आँसू कैसे छुपाएँ

होश और उन की दीद का दावा, देखने वाले होश में आएँ

दिल की तबाही भूले नहीं हम, देते हैं अब तक उनको दुआएँ

रंग-ए-ज़माना देखने वाले, उन की नज़र भी देखते जाएँ

शग़्ल-ए-मोहब्बत अब है ये ‘तस्कीन’, शेर कहें और जी बहलाएँ


इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया

June 4, 2008

रचना: सुदर्शन ‘फ़ाकिर’
स्वर: बेग़म अख़्तर

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया

रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें ‘फ़ाकिर’
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने ने दिया


दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

May 13, 2008

रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: मेंहदी हसन / बेग़म अख़्तर / नूरजहाँ

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दिगार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वल-वले दैल-ए-ना-कर्दाकार के

मेंहदी हसन

बेग़म अख़्तर

नूरजहाँ


तूने बुत-ए-हरजाई

April 5, 2008

स्वर: बेग़म अख़्तर / नय्यारा नूर

तूने बुत-ए-हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई
तकता है तेरी सूरत हर एक तमाशाई

पहले से न सोचा था अंजाम मोहब्बत का
तब होश में आये हैं जब जान पे बन आई

जी भर गया दुनिया से अब दिल में ये हसरत है
मैं हूँ या तेरा जलवा और ग़ोशा-ए-तनहाई

तानों से है दिल ज़ख़्मी ज़ख़्मों से जिगर ख़ूँ है
लो दिल के लगाने की हमने ये सज़ा पाई

बेग़म अख़्तर

नय्यारा नूर


ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

April 2, 2008

रचना: शक़ील बदायूँनी
स्वर: बेग़म अख़्तर

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

कभी तक़दीर का मातम, कभी दुनिया का गिला
मंजिल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया
(गाम == कदम)

जब हुआ जिक्र जमाने में मोहब्बत का ‘शक़ील’
मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया